श्रद्धेय महादेवी वर्मा को समर्पित
वेदने तू यह बता दे
क्यों हृदय है श्रांत तेरा,
चिर विरह की स्वामिनी तू,
क्यों है मन उद्भ्रांत तेरा।
बस क्षणिक भर ही सही,
तू मुझे इतना बता दे,
नीर-भरी बदली रही क्यों?
ना मिला क्यों नभ का एक कोना?
प्रेरणा तू है सभी की,
एक पल को बस मेरी होना।
आधुनिक मीरा कहें सब,
क्या विष तुझे भी पड़ा था पीना?
प्रथम पूज्य गणपति की भाँति,
जी चाहे तुझको ही पूजना।
सबकी ही तूलिका यह कहती,
काव्य-जगत की तू है प्रेरणा।
चाहती हूँ पढ़ सकूँ बस,
विरह-विलसित तृप्त उर वो,
क्यों रिसता ही रहा जो,
एक ही रस के सुर को।
सच कहूँ हे वरद-पुत्री,
तेरी है जो काव्य-साधना,
नित्य प्रतिदिन मैं करूँ बस,
उसकी ही सदा आराधना।

सवितासिंह, मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
सुन्दर भावपूर्ण एवं मार्मिक कविता बहुत बहुत बधाई
सुन्दर मार्मिक कविता बहुत बहुत बधाई