खिड़की से झाँकती ज़िंदगी के दो रंग”

पर्दा हटाते ही अल सुबह
कमरे की खिड़की पर नाचने लगे कुछ खूबसूरत दृश्य
देखा मैंने –
बहुत से कबूतर
कुछ गौरैया
दो बुलबुल,
एक कोई कोयल सरीखी
और दो चार फ़ाख्ता
चुग रही थीं दाना साथ साथ

बाद में बड़ी देर तक
एक बुलबुल
अकेली बैठी रही
पड़ोसी लैंटर के
पिलर से निकले
एक सरिए पर
रिमझिम बारिश में भीगती
गर्दन दाएं बाएं करती
उत्सुक सी देखती…

खिड़की से दिखता सामने एक बड़ा सा कैनवास
दृश्य जिसपर लगातार है बदलता रहता
धुंध और पहाड़ इस वक्त
कर रहे चुहल बाज़ी
तेज़ी से उठती धुंध
भर लेती पहाड़ को
आगोश में
प्रेम में भीगा पहाड़ आजकल
हो गया है कुछ अधिक हरा

दरवाजे के बाहर है एक अलग दुनिया
अलग अलग ही दृश्य

रस्ते किनारे बैठे एक मोची
के पास स्कूल यूनिफॉर्म में आराम से बैठी हैं
उसकी दो बच्चियां
अलमस्त लड़ा रहीं गप्पें
पास ही है स्कूल और
समय अभी बहुत है

ट्रैफिक जैम के बीच
सड़क किनारे
महिला दिखी पहचान की
पोस्ट ऑफिस में
काम करती है
हमेशा की तरह वह
Post box
का सहारा लिए खड़ी है उसकी मुद्रा मिलती है यही,
यही होता है स्थान।
संबल मिलता होगा क्या इसे
पोस्ट box से…
या कि लुप्त होते लाल रंग
पोस्ट बॉक्स को इस से…

सड़क पार करने की हिम्मत जुटाती
चौक पर खड़ी
महसूस करती मैं
पीठ पर अपनी
किताबों भरा झोला
लुप्त प्रायः किताबें…
रह रह कर जेब में फ़ोन
अलग अलग मैसेज टोन के साथ वाइब्रेट कर रहा
कितना कुछ
दिखाने सुनाने पढ़ाने को उत्सुक
खीझ उठी मैं
ब्लडी अटेंशन सीकर…

चीखते चिल्लाते गुनगुनाते या झनझनाते नहीं इसकी तरह
पोस्ट बॉक्स और किताबें
स्थितप्रज्ञ वे देखते
बदलती दुनिया उदासीनता से

सोचती मैं
अभी समय है
क्यों न लौट चलूं वापस
उन्हीं खूबसूरत
दृश्यों की ओर…
फिर आता है खयाल
दृश्य भला कब किसके
लौट आने की
प्रतीक्षा में ठहरे।

दीप्ति सारस्वत, प्रसिद्ध लेखिका, शिमला

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