
डॉ. मंजूलता, प्रसिद्ध साहित्यकार, नोएडा
काश! मैं फूल होती काश का
तुम्हारे मानस-पटल पर
पड़ी स्याह परतों पर
अपने नर्म-नर्म फूलों से
रुई के फाहे-सा ढक देती।
ख़्वाहिशें जो तुम्हारी
दबी-दबी-सी हैं, उन्हें काश के फूलों के
उड़ते-हिलते फाहों से
सजा देती।
बिखरते तो ख़्वाहिशों की तरह
काश के फूल भी,
पर शरद ऋतु आते
कहाँ रोक पाते खिलने
से ख़ुद को!
तेरे मन में भी मैं
शरद ऋतु-सा नीला-नीला आकाश,
उस पर से झरती शीत,
और भीगता हुआ काश
फूल उगा देती।
बेहतरीन
बहुत सुंदर चित्रण,
काश के फूलों के नए -नए प्रयोग एक विचारों
की श्रंखला बनाती जाती है जो विश्लेषण करने पर पाठकों को मजबूर कर देती है।
सुन्दर और संवेदनशील लेखन ज़ारी रखिए
सुश्री मंजुलता जी
एक निवेदन
रचनाओं पर प्रतिक्रिया देने के लिए आपका धन्यवाद, यह अवश्य हमारे साथियों का उत्साहवर्धन करेगी और नवसृजन के लिए प्रेरित करेगी. बस एक छोटा सा निवेदन है आप सभी से कि आप अपने शहर का भी उल्लेख कर देंगे तो हमें और हमारे साथियों को लगेगा की उनकी रचनाएं कहां-कहां तक पढ़ी जा रही है.
आपका साथी