
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग
आज मन कुछ उदास है।
उसे रोशनी भी चुभन लग रही है…
सितारों को देखने की ख्वाहिश भी नहीं।
उसे भावनाओं का निर्वात चाहिए।
वो बांसुरी की धुन के साथ शांत होना चाहता है।
इतना अकेले रहने का मन है कि
किसी की भी आहट तकलीफ दे रही है।
विचारों का चक्रवात
उसे फंसा नहीं पा रहा।
होश नहीं, हवा कैसी है,
नमी का अंदाज़ा भी नहीं।
आइना सामने है,
देखकर खुद को पहचान नहीं पा रहा।
एक-एकांत की चाहत,
और तलाशती आँखें।
उसे कोई सुनने वाला साथी नहीं चाहिए,
क्योंकि आज उसने
अपनी किसी सांस को फिर जाते देखा,
जिसका वो हिस्सा हुआ करती थी।
फिर उसे याद आया
जाना जरूरी होता है,
हर किसी का।
यह शाश्वत है, सत्य है,
जिसे वो अभी स्वीकार नहीं कर पा रही है।