
सुनीता तिवारी, प्रसिद्ध लेखिका, भोपाल (मध्यप्रदेश)
सागर, तुम ही दिखाओ कोई रास्ता, लहरों
की उलझन में खो-सा गया हूँ।
किनारों की सीमाएँ थक गई हैं,
असीम गहराई से सीखना चाहता हूँ।
तूफ़ानों से डरना तुम्हें नहीं आया,
फिर क्यों भय से काँपे हर मानव मन?
टूटकर भी हर लहर लौट आती है,
संघर्ष में ही छुपा है जीवन का वचन।
कभी शांति, कभी प्रचंड आवेग हो,
फिर भी तुम सदा स्वयं में पूर्ण हो।
सागर, तुम ही दिखाओ कोई रास्ता,
जहाँ हार भी एक नई शुरुआत हो।
गहराइयों में छुपे मोती-सा धैर्य सिखाओ,
डूबकर भी कैसे उभरा जाता है, बताओ।
लहर-लहर में जो संदेश लिखे तुमने,
उसे पढ़ सकूँ, ऐसा साहस दिलाओ।
सागर, तुम ही दिखाओ कोई रास्ता,
जहाँ मौन भी उत्तर बन जाए।
जहाँ थकन टूटकर बिखरे नहीं,
बल्कि विश्वास बनकर लौट आए।