नारी देह, प्रकृति और समाज की दोहरी नैतिकता

सरिता सिंह, लेखिका, बेतिया, पश्चिम चंपारण रामनगर (बिहार)

जिस तथ्य को समाज के सामने रखने में एक तथाकथित मर्यादित नारी सौ बार सोचती है, उसी तथ्य को रखने में गाँव की स्त्री को कोई विशेष संकोच नहीं होता। वह नारी-देह के प्रश्न पर खुलकर बोलती है, पुरुषों से सीधे संवाद करती है और अपने विचारों पर स्वीकृति की मुहर भी स्वयं लगा देती है। यह बेबाक़ी अक्सर शहरी सभ्यता को असहज कर देती है, क्योंकि वहाँ ‘मर्यादा’ और ‘संकोच’ को स्त्री के चरित्र से जोड़कर देखा जाता है।

गाँव की औरतों से संवाद कीजिए-सेक्स जैसे विषय पर बात करना उनके लिए कोई वर्जित क्षेत्र नहीं है। न कोई बनावटी शर्म, न कृत्रिम हिचकिचाहट। वे पुरुषों के मन और व्यवहार की परतें इस तरह खोल देती हैं कि शहरी समाज का शिक्षित पुरुष भी असहज हो जाए। यही कारण है कि ग्रामीण परिवेश में बच्चे-बच्चियाँ अक्सर उम्र से पहले ‘समझदार’ हो जाते हैं, या यूँ कहें कि उम्र से पहले बोझिल। सोलहवें बसंत से पहले ही वे जीवन की जटिलताओं से टकराने लगते हैं और बीस की उम्र तक आते-आते भीतर से थके, बाहर से बूढ़े दिखाई देने लगते हैं।

यह दृश्य मन को बेचैन करता है और प्रश्न उठता है-आख़िर इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार कौन है? क्या यह स्त्रियों की बेबाक़ अभिव्यक्ति है? या फिर पुरुषों से बना वह अत्यधिक क़रीबी रिश्ता, जो अपरिपक्वता के बावजूद परिपक्व संबंध निभाने का दबाव पैदा करता है? किसी ने ठीक ही कहा है-गाँव में बचपन मुस्कुराता नहीं, खिलखिलाता है। लेकिन वह खिलखिलाहट बहुत जल्दी भौतिक ज़िम्मेदारियों में बदल जाती है और जीवन, बिना रुके, आगे बढ़ जाता है।

इसके विपरीत शहरों में सेक्स पर खुलकर बोलने वाली स्त्रियाँ गिनी-चुनी होती हैं। वे अक्सर ओशो जैसे विचारकों का उदाहरण देती हैं। ओशो ने सेक्स को केवल शारीरिक क्रिया नहीं माना, बल्कि उसे समाधि का द्वार कहा-एक ऐसा मार्ग जो मनुष्य को चैतन्य की ओर ले जाता है और अंततः परमात्मा से जोड़ता है। पर शहरी समाज ने ओशो के विचारों को भी आधा-अधूरा समझा सेक्स लिया, समाधि छोड़ दी। मेरे विचार में सेक्स प्रकृति का दिया हुआ वह मूल उपहार है, जिससे पूरी सृष्टि संचालित होती है। फिर भी कुछ कुत्सित मानसिकता और कुख्यात विचारधाराएँ इसे गंदगी के तराज़ू में तौलकर नारी को चरित्रहीन ठहराने में संकोच नहीं करतीं। विडंबना यह है कि जिस प्रकृति का तृण-तृण इस प्रक्रिया से वंचित नहीं है, उसी प्रकृति की प्रतिनिधि स्त्री को समाज अपराधी बना देता है।

समंदर की लहरों का साहिल के क़रीब आना केवल सौंदर्य का दृश्य नहीं होता। वह अपने साथ लाखों रेत के कण लाकर किनारे छोड़ जाती है, ताकि तलहटी में एकत्र जल दूर-दूर तक फैली रेत को ठंडक दे सके। यही प्रकृति का संतुलन है गहन, मौन और सार्थक। समाधि ही शिव है और शिव ही सुंदर है। यही सुंदरता पूरी प्रकृति में व्याप्त है। फिर प्रकृति से मिलन और उसका प्रजनन यदि चरित्रहीन कहलाता है, तो यह शब्द स्वयं अपने अर्थ का खंडन नहीं करता क्या?

3 thoughts on “नारी देह, प्रकृति और समाज की दोहरी नैतिकता

  1. तार्किक ,विचारणीय लेख,,मै भी गांव से संबंधित हूं पर हर जगह इस मुद्दों पर इतनी सहजता से बात नहीं किए जाते हैं,शायद ये निर्भर करता है किसी स्थान विशेष के परिवेश,वातावरण पर ।आपने बहुत ही मनमोहक लेख लिखा है,लिखते रहिए।

  2. प्रकृति की सुन्दरता और समझ एक पवित्र अनुभूति होती है । गांवो में यह सहज रूप में भाषा और व्यवहार में प्रयुक्त होती है लेकिन शहरों में इसको संकोच के पर्दों के पीछे रखना
    ” अनुशासन ” कहलाता है । इसलिए शहरीकरण स्त्री-पुरुष को सत्य से दूर
    मिथ्याभाषी बना देता है ।
    बहुत अर्थपूर्ण लेख ।

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