मैं भी मनुष्य हूँ…

भारतीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति आत्मविश्वास के साथ खड़ा, पृष्ठभूमि में संविधान की प्रतीकात्मक छवि

रेनू शब्दमुखर, प्रसिद्ध लेखिका और हिंदी विभागाध्यक्ष, ज्ञानविहार स्कूल, जयपुर।

मैं न स्त्री हूँ,
न पुरुष की परिभाषा में कैद
मैं प्रकृति का तीसरा सत्य हूँ,
जिसे समाज ने हाशिये पर छोड़ दिया है।

मेरे भी सपने हैं,
मेरे भी आँसू हैं,
मेरी भी हँसी में जीवन की धड़कन है
पर तुम्हारी दृष्टि में
मैं केवल उपहास का पात्र हूँ।

तुम्हारे धर्मग्रंथों में
मेरे अस्तित्व के प्रमाण हैं,
तुम्हारे इतिहास में
मेरे सम्मान के उदाहरण हैं,
फिर भी आधुनिक सभ्यता में
मैं सबसे अधिक अपमानित हूँ।

मैं मंदिरों में आशीर्वाद दूँ तो देवी,
शादियों में जाऊँ तो मंगलकारी,
पर समाज में रहूँ तो
अपशकुन, अपमान और उपेक्षा।

तुम्हारी भाषा ने मुझे
‘छक्का’, ‘हिजड़ा’, ‘किन्नर’ कहा
पर किसी ने यह नहीं पूछा
कि मेरे दिल का नाम क्या है।

मैं भी माँ बनना चाहती थी,
मैं भी पिता की छाया चाहती थी,
मैं भी प्रेम के शब्द सुनना चाहती थी—
पर मुझे केवल सहानुभूति नहीं,
सम्मान चाहिए था।

मैं भी इस देश की नागरिक हूँ,
मेरे पास भी संविधान है,
मेरे भी अधिकार हैं
पर अधिकारों से पहले
मुझे तुम्हारा स्वीकार चाहिए।

मुझे दया नहीं चाहिए,
मुझे भीख नहीं चाहिए,
मुझे मंच चाहिए,
मुझे अवसर चाहिए,
मुझे तुम्हारे बीच
मनुष्य की तरह खड़े होने का अधिकार चाहिए।

आज मैं प्रश्न हूँ तुम्हारे समाज से
जब प्रकृति ने मुझे बनाया,
तो तुम कौन होते हो
मुझे मिटाने वाले?

जब ईश्वर ने मुझे स्वीकारा,
तो तुम कौन होते हो
मुझे ठुकराने वाले?

मैं तीसरा लिंग नहीं
मैं तीसरा सच हूँ,
जो तुम्हारी सोच के
दो ध्रुवों से बाहर खड़ा है।

और याद रखना
जिस दिन तुमने मुझे अपनाया,
उस दिन तुम्हारा समाज
सच में सभ्य कहलाएगा।

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