
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका
बैलों की रुनझुन बजती घण्टियाँ ,ढाक और कास के वन, पक्के गेंहू की सुनहरी बालियां, हवा के वेग से झूलते पीपल के गुलाबी पात!
नदी की तेज धार मानो उफनते दूध का झाग… और साँझ सवेरे चूल्हे की सुलगती आग…गर्म-गर्म रोटियां …गीले गुड़ सी बोलियां…!
“अहा! अम्मा देखो न! कवि ने कितना सुंदर गांव बनाया है! ऐसे ही गांव में चलो न रहने! किधर मिलेगा ऐसा गांव? बोलो न बाबू को ढूंढने!”
“ई झूठा गांव है बेटा! किताब छोड़, ई पन्नी बांधने में मदद कर। बहुते पानी टपक रहा…”
तभी बाहर तेज़ चिल्लाने की आवाज़ आयी! चीख-पुकार!
मुनिया की अम्मा दहल गयी!
विक्षिप्त सा रघु झोपडी में घुसा!
“जल्दी निकलो मुनिया की अम्मा! गंगा मैया ने लील लिया सब.. बगल का गांव समेट लिया गंगा मैया ने! आदमी-औरत,बच्चे, मवेशी… कुछ न बचा! पूरा पानी-पानी! अब अपने गांव की तरफ आ रही…चलो जल्दी, सबलोग ऊपर पहाड़ी पर जा रहे जान बचाने!”
“लेकिन…अपनी झोंपड़ी…खेत!”
“जान झूल रही! तुमको झोंपड़ी की पड़ी है पगलिया.! गांव कटान पर है!”
रघु चीत्कार उठा–“चलो..निकलो! चल मुनिया निकल बेटा..”
रघु ने मुनिया का हाथ खींचा!
बाहर निकलती मुनिया ने पलटकर किताब को देखा!
छत से टपकते पानी में अक्षर धुंधले होने लगे…
रुनझुन बैलों की घण्टियाँ… ढाक और कास के वन…पक्के गेंहू…मीठे गुड़…
सब पानी-पानी!