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गायत्री बंका, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
वृद्धाश्रम कीं बेंच पर,
बैठ बैठ कर सोचे ।
कहाँ कमी रह गयी-
मन दुविधा से खरोंचे ।।
पराये घर की बेटी को,
बुरा बोलूँ कैसे ।
जब अपना जाया ही मेरी –
गति करे वो ऐसे ।।
माँ का पल्ला थाम कर ,
बड़े हुये वो बच्चे ।
आज धन दौलत के आगे –
बन रहे कैसे सच्चे ।।
पोता बोले दादी को ,
मैं बनुंगा तेरा सहारा ।
पर दादी बोले माँ बाप को-
देना सुख तुम सारा ।।
मन भारी कर छोड़ चली ,
मन मे उठ रही टीस ।
एक गले में माला थी
बस उससे भर रही फ़ीस
दुनिया की है रीत अनोखी ,
माँ-बाप लगे अब बोझ ।
पर ये क्यूँ भूल जाते वो –
बुढ़ापा सतायेगा उन्हें एक रोज़ ।।