मुंबई में ‘बतरस’ ने रचा प्रेम का बहुरंगी महोत्सव

मुंबई के केशव गोरे स्मारक भवन में आयोजित ‘बतरस’ कार्यक्रम में प्रेम विषय पर कविता और संगीत प्रस्तुति देते कलाकार

मुंबई से डॉ. मधुबाला शुक्ल की रिपोर्ट

मुंबई। शरत् ऋतु के मदनोत्सव और ‘वैलेंटाइन डे’ के उपलक्ष्य में साहित्यिक संस्था ‘बतरस’ द्वारा फरवरी माह में ‘है प्रेम जगत में सार’ शीर्षक से एक विशेष साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह आयोजन मुंबई के गोरेगाँव स्थित केशव गोरे स्मारक भवन के तीसरे हॉल में संपन्न हुआ, जहाँ प्रेम के विविध रूपों पर गंभीर और सरस विमर्श ने वातावरण को भावमय बना दिया।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात कवि विनोद दास ने ‘बतरस’ से अपने दो दशकों पुराने आत्मीय संबंधों को स्मरण करते हुए बताया कि वर्ष 2006 के आसपास डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी के निवास पर आयोजित गोष्ठियों से उनका जुड़ाव रहा है। उन्होंने इस सतत साहित्यिक यात्रा पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए डॉ. त्रिपाठी एवं बतरस-परिवार के सभी सदस्यों को साधुवाद दिया।

अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा, “प्रेम पर बोला नहीं जाता, प्रेम किया जाता है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रेम को केवल शास्त्रीय विमर्श तक सीमित कर देने से उसका रस कम हो जाता है, किंतु वर्तमान समय में प्रेम पर संवाद आवश्यक है, क्योंकि समाज में बढ़ती घृणा और विभाजन की प्रवृत्तियाँ चिंता का विषय हैं। धर्म और जाति के नाम पर दूरी बढ़ाने वाली शक्तियों के बीच प्रेम की चर्चा सांस्कृतिक प्रतिरोध का कार्य करती है।

विनोद दास ने प्रेम की उत्पत्ति ‘आकर्षण’ या ‘लोभ’ से मानते हुए कहा कि जब यह भाव सघन होता है तो प्रेम में रूपांतरित हो जाता है। भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ के संदर्भ में उन्होंने श्रृंगार रस को प्रेम का आधार बताया, जिसमें संयोग और वियोग दोनों स्थितियाँ शामिल हैं। कालिदास के ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ में दुष्यंत-शकुंतला के प्रेम का उदाहरण देते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति में प्रेम की गहरी परंपरा को रेखांकित किया।

‘वैलेंटाइन डे’ के संदर्भ में संत वैलेंटाइन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेम सदैव सत्ता के लिए चुनौती रहा है। पाश्चात्य चिंतन में सुकरात, अरस्तू, ज्याँ पॉल सार्त्र और सिमोन द बोउआर के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने प्रेम में स्वतंत्रता, नैतिकता और स्वायत्तता के आयामों को स्पष्ट किया।

हिंदी साहित्य में प्रेम के विविध रूपों की चर्चा करते हुए उन्होंने तुलसीदास, कबीर, रीतिकालीन कवियों, महादेवी वर्मा तथा नई कविता के संदर्भ प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज प्रेम को पूर्ण स्वतंत्रता नहीं देता और विवाह-प्रथा को समाज एवं यौन-आकांक्षा के बीच संतुलन का माध्यम बताया। अंत में उन्होंने अपने काव्य-संग्रह ‘पतझड़ में प्रेम’ से ‘पतझड़ में प्रेम’, ‘गाँठ’ और ‘चालीस साल’ शीर्षक कविताओं का पाठ किया।

कार्यक्रम का आरंभ शायर कृष्णा गौतम की स्वरचित ग़ज़ल से हुआ। कवयित्री अर्चना वर्मा सिंह ने गगन गिल की कविता ‘प्रेम में लड़की शोक करती है’ का पाठ करने के साथ अपनी रचना भी प्रस्तुत की। कवि नीरज ने केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘हे मेरी तुम’ का भावपूर्ण पाठ किया तथा अपनी नज़्म सुनाई। कवयित्री अम्बिका झा ने वीरेन डंगवाल की कविता ‘प्रेम के बारे में एक शब्द नहीं’ के साथ अपनी कविता प्रस्तुत की।

कवि अनिल गौड़ ने घनानंद के सवैये ‘अति सूधो सनेह को मार्ग है…’ का प्रभावशाली पाठ किया। कवयित्री रीमा राय सिंह एवं लेखक विराट गुप्ता ने अपनी-अपनी रचनाएँ सुनाईं। जवाहरलाल निर्झर ने लोकगीत प्रस्तुत कर वातावरण को लोक-रस से भर दिया, जबकि कमर हाजीपुरी के प्रेमगीत ने भावनात्मक ऊँचाई प्रदान की।

संगीत प्रस्तुति में दीपक खेर ने फिल्म ‘संगम’ का प्रसिद्ध गीत “मेरा प्रेम पत्र पढ़ करके तुम नाराज़ न होना” गाकर श्रोताओं को रोमांचित किया। प्रज्ञा मिश्रा ने नरेंद्र शर्मा की कविता ‘आज के बिछड़े न जाने कब मिलेंगे’ को सुरमयी स्वर दिया। अध्यापिका डॉ. जया दयाल ने मराठी गीत “मालवून टाक दीप” का भावपूर्ण गायन किया।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण प्राचार्य बृजेश सिंह की प्रस्तुति रही। उन्होंने सूरदास का पद ‘बूझत श्याम कौन तू गोरी’ लयबद्ध शैली में प्रस्तुत किया, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा।

वॉयस एक्टर सोनू पाहुजा ने अखलाक अहमद ज़ई की कहानी ‘कटीले तारों का प्रेम’ का पाठ किया। रंगकर्मी प्रमोद सचान ने सुरेंद्र वर्मा के नाटक ‘सूर्य की अंतिम किरण से सूर्य की पहली किरण तक’ के पात्र ‘ओक्काक’ को जीवंत कर मंच पर प्रस्तुत किया।

प्रसिद्ध मंच अभिकल्पक एवं रंग-निर्देशक जयंत देशमुख ने कार्यक्रम को शुभकामनाएँ देते हुए कहा, “मेरे लिए प्रेम, बस प्रेम ही है।”

कार्यक्रम का आयोजन डॉ. मधुबाला शुक्ल ने किया तथा संचालन मंच एवं मीडिया की युवा अभिनेत्री शाइस्ता खान ने किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम संपन्न हुआ।

यह सांस्कृतिक संध्या प्रेम की सांस्कृतिक, दार्शनिक और साहित्यिक यात्रा का सजीव उत्सव बनकर उपस्थित श्रोताओं के मन में लंबे समय तक स्मरणीय बनी रही।

One thought on “मुंबई में ‘बतरस’ ने रचा प्रेम का बहुरंगी महोत्सव

  1. मधु जी आपकी रिपोर्ट पढ़कर कार्यक्रम का एक चित्र सजीव हो गया ।
    उस शाम,शामिल न हो सकने का अफसोस है ।

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