
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
एक लंबे समय के बाद जब उस स्टेशन पर उतरी, तो यादों की महकती खुशबू मुझे बाँहों में जकड़कर मेरा स्वागत करने को आतुर हो उठी। कितना कुछ बदल जाने के बावजूद भी वही हवा, वही आसमान, वही तारे, वही अहसास जो यादों के गलियारों से मुझे बचपन में घसीटने लगे।
रजाई-गद्दे भरने की सबसे बड़ी दुकान, जहाँ की उड़ती हुई रुई हमारे बालों में जमकर सफ़ेदी का एहसास कराती और हम आईने में देखकर बड़े खुश होते कि हम भी बड़े हो गए। मन को समझा रही थी हो सकता है वह दुकान अब न हो, पर नीम का पेड़ तो बहुत बड़ा था। वह पेड़, वह निंबोली, टूटी-फूटी बस जिसमें हमारा आशियाना था. वहाँ मैं दौड़कर पहुँच जाना चाहती थी। टैक्सी वाले से जैसे ही मैंने वहाँ चलने के लिए कहा, उसने अजीब-सी नज़र से मुझे देखा। फिर कहा… “ऐसा कहिए ना मैडम, आपको शुभम मॉल जाना है।”
एक ही पल में जैसे यादों की खुशबू आँसुओं के इत्र में तब्दील हो गई। नीम की डाली टूट गई। मीठी निंबोली खाते हुए बस का आशियाना ढह गया, और पल भर में ही चलता-फिरता शहर अचानक थम गया।
भावनात्मक कहानी
छोटे में गहन बात आपने कह दी।