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मन बंजारा

सपना चंद्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कहलगांव, भागलपुर (बिहार)

जाने किस खोज में
मन बंजारा सा हुआ है
तपती रेत भी उसे
बड़ी अच्छी लगती है

गर्म हवा के थपेड़े
तन झुलसा देती है
दूर कहीं क्रंदन है
कभी यूं ही हँसा देती है

माथे पर बिंदिया
हाथों में चुड़ियाँ
झूल-झूलकर बालियाँ
गालों को सहला देती है

रंग-बिरंगे घाघरे
मटमैले से सपने
उजाले में तरसती नींद को
चाँदनी सबको सुला देती है

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