अब मैं खाली हूँ…

पहले तो

बहुत कहा,

बहुत समझाया,

हर चुप्पी पर सवाल किए,

हर दूरी पर नज़दीकी माँगी।

फिर धीरे–धीरे

शब्द थकने लगे,

मन बुझने लगा,

और शिकायतें

कपड़ों की सिलवटों में छुप गईं।

अब मैं

बस रसोई की भाप,

बरामदे की धूल

और घड़ी की टिक टिक

के साथ रहती हूँ 

तुम्हारे साथ नहीं।

जब तुम लौटे 

पुराने दिनों की तरह,

आँखों में वही अधूरा वादा लिए,

तो मेरे भीतर

कोई दीया नहीं जला,

कोई फूल नहीं खिला।

मेरे आँगन का चाँद

बहुत पहले उतर चुका था,

दीपक बुझे थे,

और हथेलियों का उजाला

किसी और सुबह में जा चुका था।

अब जो मैं हूँ 

वह केवल एक खाली घर है

जहाँ तुम मेहमान हो,

और प्रेम,

बस एक पुरानी चीज़

जिसे मैं संभाल कर

कहीं रख चुकी हूँ।

सवितासिंह मीरा, सुप्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

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