
डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध साहित्यकार, उज्जैन
मैं सच को बयां करती हूं
अंगारों पर चलती हूं
मैं गीत नए रचती हूं
ख्वाब नए चुनती हूं
गहन तम को चीरकर
अरुणिमा जगाती हूं
टूटकर बिखरती हूं
खुद को पिरो लेती हूं
सूरज से आग लिए
दीपक से राग लिए
धरती का हरितस्वप्न
आंचल में सजाती हूं
कांटो की पृष्ठ पर
फूलों की कलम से
वसंत की आस लिए
पतझड़ को गले लगाती हूं
मैं सच को बयां करती हूं
अंगारों पर चलती हूं…
वाह्ह्हह्ह्ह्ह बहुत ही सुन्दर सच कहूं तो मज़ा आ गया, शुभकामनायें 🙏
बहुत अच्छी रचना
सुंदर लेखन