अखिल भारतीय हिंदी उर्दू एकता अंजुमन’ संस्था द्वारा बाहरी दिल्ली के नांगलोई इलाके में एक शानदार मुशायरा और कवि सम्मेलन (एक शाम एहतराम सिद्दीकी के नाम) का आयोजन सुरभि स्टूडियो में किया गया। इसकी सदारत मशहूर शायर ख़ुमार देहलवी साहब ने की। मुख्य अतिथि फहीम जोगापुरी, अनिल मीत और अनस फैज़ी रहे।
मुशायरे का आगाज़ ताबिश खेराबादी ने ‘नात-ए-पाक’ से किया। निज़ामत असलम बेताब ने बेहद खूबसूरत अंदाज़ में निभाई। इस मुशायरे में दिल्ली और इसके आसपास के शहरों से आए लगभग 35 शायरों और शायरा ने शिरकत की और अपने-अपने कलाम पेश किए, जिन्हें वहाँ मौजूद श्रोताओं ने खूब सराहा।
‘जश्न-ए-हिंदुस्तान’ मुशायरे में जिन शायरों ने बेहतरीन कलाम पेश किया, उनमें शामिल रहे:
जावेद अब्बासी, अंदाज़ अमरोहवी, आज़म हुसैन, इब्राहीम अल्वी, राजीव तनेजा, अंकुर अग्रवाल, ताबिश खेराबादी, हाशिम देहलवी, हश्मत भारद्वाज, वफ़ा आज़मी, रंजन शर्मा, गोल्डी गीतकार पदम, सैयद गुफरान अहमद राशिद, अशोक साहिब, प्रतीक प्रवीण व्यास, जितेंद्र जीत, आरिफ अंसारी, एहतराम सिद्दीकी, जाहिल नखलवी,
तूलिका सेठ, मधु लबाना, संगीता चौहान सदफ, हुमा खातून देहलवी, भावना और श्वेता श्रीवास्तव।
पेश किए गए कुछ प्रमुख शेर:
“सब के सब तीरगी से डरते हैं, हम मगर रौशनी से डरते हैं”
— ख़ुमार देहलवी
“दुश्मन नहीं हो कोई तो क्या लुत्फ़-ए-ज़िंदगी, वो क्या चराग़ जिस की मुख़ालिफ़ हवा न हो”
— फहीम जोगापुरी
“मैंने काँटों को सर पे रक्खा है, सारे फूलों का चेहरा उतरा है”
— अंदाज़ अमरोहवी
“शायरी की बिसात उर्दू है, शेर की कायनात उर्दू है”
— असलम बेताब
“खूबसूरत नहीं कोई तुम सा, इतना कहने में क्या बुराई है”
— जावेद अब्बासी
“जितनी जिस की उड़ान बाकी है, उतना ही आसमान बाकी है”
— अनिल मीत
“सर पे चढ़ते हैं लोग उतना ही, आप जितना लिहाज़ करते हैं”
— पदम प्रतीक

रंजीता सिंह फलक, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली
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