बहुत जी करता है

सवितासिंह मीरा, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

बहुत जी करता है
जी लूँ हर वह क्षण,
जब नटनगर रास रचाते थे,
मधुर बंसी की तान पर
संसार को मोहित कर जाते थे।

बहुत जी करता है
देखूँ वह रात, जब जन्म लिया नागर ने,
कैसे सो गए पहरेदार,
कैसे खुल गईं जंजीरें,
कैसे उमड़ता यमुना का जलस्तर
उनके पग-स्पर्श से धीरे-धीरे थम गया।

बहुत जी करता है
जी लूँ वह पल जब यशोदा मैया
लाल संग खेला करती थीं,
जब बलदाऊ संग गोपाल सखा
गली-गली में विचरते थे।
देखूँ सुदामा का स्नेह,
गोपियों की चहकती हँसी,
और कान्हा की माखन चोरी।

बहुत जी करता है
सुनूँ ब्रज की नारियों की शिकायतें,
देखूँ राधा संग उनका अनन्त प्रेम,
महसूस करूँ वह छेड़खानी,
जहाँ बंसी की धुन पर
हर हृदय स्वयं को भूल जाता था।

कभी-कभी लगता है
यह भाव जो हृदय में उमड़ता है,
शायद उस युग की कोई स्मृति है।
क्या मैं भी कोई गोपी थी?
या ललिता-सी सखी,
वृषभानुजा सम प्रेमिका?
क्या यह पुनर्जन्म उसी का परिणाम है?

नहीं, मैं रुक्मिणी नहीं जीना चाहती,
मैं जीना चाहती हूँ मीरा का विरह,
राधा का अनन्य प्रेम,
गोपियों का उल्लास,
ब्रज की होली का रसमय रंग।

बहुत जी करता है
जी लूँ वह पल जब
नटवर नागर ने गोपियों के वस्त्र छुपाए थे,
जब यमुना किनारे राधिका को बुलाने
बंसी की मधुर तान गूँजती थी।
काश! उस युग में मेरा जन्म हुआ होता,
काश! मैं भी एक गोपी होती,
और कान्हा के चारों ओर
चक्कर काटती रहती।

बहुत जी करता है
देखूँ कंस का वध,
पांडवों की रक्षा,
द्रौपदी की लाज बचाते वे करुणा-मूर्ति।

जीना चाहती हूँ हर वह क्षण,
जहाँ कृष्ण हैं, जहाँ प्रेम है,
जहाँ समर्पण है।

क्योंकि
कृष्ण बनना तो सरल नहीं,
पर कृष्ण में खो जाना
यही सबसे बड़ा सुख है।

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