तुम क्या जानो…

तुम क्या जानो
प्रेम क्या होता है, क्योंकि हर बार
तुम्हारे अहं के आगे झुक जाता है मेरा खामोश प्रेम।

जानते हो दर्द की लहर क्या होती है? प्रेम ही तो है, पीड़ा असहनीय।

तुम्हारे लिए आधिपत्य,
मेरे लिए अपरिभाषित।
तुम्हें प्रेम में हारना
कभी मंज़ूर नहीं, और
हम तो सदा
हारकर खुश हैं।

तुम्हारे लिए प्रेम
सदैव पाना है,
तुम्हारी तलाश इसीलिए
कभी मुकम्मल होती नहीं—
अशांत से रहते हो।

और हम दूर रहकर भी
शिद्दत से प्यार को
महसूस लेती हैं।

तुम्हें पता ही नहीं,
हर औरत में
कहीं न कहीं
एक मीरा होती है,
जो प्रतिदान की आशा बगैर
बस प्रेम करती चली जाती है।

तुम अनजान हो एक
औरत के अंदर की राधा से,
जो ताउम्र बिन फेरे
प्रेम को निभाती रही।

ना ही तुम टुकड़ों
में बंटी द्रौपदी-रूपी स्त्री के मर्म को
समझ पाए कभी।

हर युग में पलड़ा
तुम्हारा ही भारी रहा।
हर युग में
प्रेम को तुमने जीता
और हमने जिया है।

हाँ, उस अनुभूति,
उस दर्द, उस विरह,
उस त्याग को,
और अंततः कलंक—
सब कुछ हमने जिया।

अब समझ सको तो समझो इस पहेली को—
प्रकृति ने हमें
सृजन का गौरव
यूँ ही नहीं दिया।

एक स्त्री के गर्भ से
जन्मता है नया जीवन,
और इसी के साथ
हो जाते हैं दफ़्न
कई दर्द, अनुभूतियाँ,
अपमान, आँसू, बिछोह, कलंक।

जो माँ नहीं बनती,
वो सुलगती रहती है भीतर ही
या फिर बन जाती है चलता-फिरता मज़ार।

सीता हर युग में हुई।
देखो, सच कहना—क्या तुम बन सकते हो सिर्फ एक बार राम?
सिर्फ एक बार कर सकते हो अपना हृदय ताउम्र
किसी एक के नाम?

प्रीति दास प्रधान, प्रसिद्ध लेखिका, भिलाई (छत्तीसगढ़)

3 thoughts on “तुम क्या जानो…

  1. सच में कोई भी पुरुष नारी जैसा महान नहीं है चाहे किसी भी युग में हो

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