घर वापसी

राकेश चंद्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ

किसी यात्रा से घर वापस लौटने का सुख
वही जान सकता है जिसने नापी हो
अनजान डगर अपनी किस्मत के सहारे,
और महसूस किया हो घड़ी की एक-एक धड़कन को;
पूरे दिन की भाग-दौड़ के बाद
किसी सड़क चलते होटल में खाने की
जिसने की हो पूरी औपचारिकता;
जिसने गंतव्य स्थल की ओर जाने वाली
बस या रेलगाड़ी की अन्तहीन प्रतीक्षा में
बहाया हो पसीना-किसी निर्झरणी
की तरह; और बुझाई हो अपनी भूख,
स्टेशन की पानीदार चाय से,
खासकर रात के समय में;

अक्सर काम पूरा होने के बाद
बेतहाशा भागते हुए ट्रेन पकड़ना या
फिर हवाई अड्डे का रुख करना,
यह जताता है कि घर लौटना कितना ज़रूरी है!
घर लौटते हैं लोग क्योंकि उन्हें
अपनी जड़ों से वापस जुड़ना है
जिससे वो हो गए थे दूर, समय के
अलग-अलग अन्तरालों के लिए;
इसीलिए बहुत अच्छा लगता है
अपनों से फिर से जुड़कर, उनसे मिलकर,
घर वापसी के बाद.

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