ख्वाहिशें

ख्वाहिश भी किसी
जिद्दी औरत की तरह ही…
चाहती हैं जाने क्या क्या?
कभी दबे धन की इच्छा
कभी पेड़ से बरसेगा पैसा
जन्म लेती हैं दिमाग में
घर भी लेती हैं बना…
जरूरतों का परिवार
अपना जाने कितना
लेती हैं बढ़ा ,पूरी ना हों जिद्द
तो, पड़ी अंधेरी गलियों में !

खत्म नहीं होती पर ख्वाहिश
युग-युगान्तर या सदियों में
इच्छा से इंसान बने और
इंसान है, तो है इच्छा
इन दोनों का लगता है
कितना प्यारा सा रिश्ता!
अलसाई सकुचाई रहती
जब मनपसंद ना कुछ होता
लेकिन सदियों सदियो से
बहता आया इसका सोता!

सुनीता सोलंकी ‘मीना’ मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)

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