
रेणु परसरामपुरिया, लेखिका, मुंबई
बीते दिनों घटित एक घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। क्या कोई 84 वर्ष की उम्र में 16वीं मंज़िल से छलांग लगाकर मौत को गले लगा सकता है?
सुनने में अविश्वसनीय लगता है, पर यही कड़वी सच्चाई है. हर उम्र, हर परिस्थिति में संघर्ष मौजूद हैं।हम अक्सर मान लेते हैं कि बुज़ुर्ग जीवन के इस पड़ाव तक पहुँचते-पहुँचते हर लड़ाई जीत चुके होते हैं। उम्र भर की जद्दोजहद, उपलब्धियाँ, रिश्ते सब कुछ हासिल करने के बाद क्या इंसान इतना टूट सकता है कि जीवन को खत्म कर देना ही आख़िरी विकल्प लगे? 80–85 वर्ष की उम्र तक पहुँचकर इंसान को यह एहसास होता है कि जीवन का समय अब सीमित है। फिर भी, ऐसी चरम प्रवृत्ति… क्यों?
यही सबसे बड़ा सवाल है।सुख-सुविधाएँ, प्यार करने वाले बच्चे, खुशहाल परिवार ये सब कभी-कभी उस दर्द को रोक नहीं पाते जो भीतर चुपचाप पनप रहा होता है। सच यह है कि उम्र के इस मोड़ पर इंसान की मानसिक और भावनात्मक सहनशक्ति पहले जैसी नहीं रह जाती। शारीरिक बीमारियों का इलाज हम ढूँढ चुके हैं, लेकिन मानसिक टूटन और अकेलेपन का इलाज अभी भी उपेक्षित है।
मेडिकल साइंस ने उम्र बढ़ा दी है, पर “जीने की इच्छा” बढ़ाने का विज्ञान अभी भी अधूरा है।
बुज़ुर्गों की मानसिक सेहत को हम गंभीरता से नहीं लेते, जबकि यही सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। धीरे-धीरे बढ़ती अकेलापन, असुरक्षा, निर्भरता का डर, दर्द, याददाश्त संबंधी समस्याएँ और संवादहीनता, ये सभी परिस्थितियाँ उन्हें भीतर तक खोखला कर देती हैं। अगर कोई इंसान जीवन के अंतिम पड़ाव पर टूट रहा है, तो यह एक चेतावनी है। यह संकेत है कि कहीं न कहीं हम, हमारा समाज और हमारी व्यवस्था, कुछ बहुत महत्वपूर्ण चूक कर रहे हैं।
हमें यह समझने की जरूरत है कि-
मानसिक स्वास्थ्य सिर्फ युवाओं का मुद्दा नहीं है।
बुज़ुर्गों के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न बन सकता है।
अब समय है कि हम सिर्फ शारीरिक उपचार ही नहीं, बल्कि मन के जख्मों को भी पहचानें।
उनसे बात करें, सुनें, समझें, और यह एहसास कराएँ कि वे अकेले नहीं हैं।
क्योंकि उम्र चाहे 18 हो या 84 दिल टूटने की क्षमता, दर्द सहने की सीमा और जीवित रहने की इच्छा सब इंसानों में बराबर होती है।
और हर आत्महत्या हमें यह याद दिलाती है हमारी संवेदनाएँ कहीं न कहीं कमजोर पड़ रही हैं।
आपने सही मुद्दा उठाया रेनू