कुछ मनकही

ऐसे जुमले ज़बान से निकले
तीर जैसे कमान से निकले।

ज़िक्र जिसका हो धड़कनों में मिरी
वो भला कैसे जान से निकले।

दम नहीं है तुम्हारी बातों में
तुम भी अपने बयान से निकले।

छुप गया देख कर कोई मुझको
हम कभी जब मकान से निकले।

चाँद फीका सा लगने लगता है
जब सनम अपनी शान से निकले।

तेरे कूचे में रूह भटकेगी
मीरा जब भी जहान से निकले।

सविता सिंह मीरा जमशेदपुर

One thought on “कुछ मनकही

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *