कासे कहूं


किश्वर अंजुम, भिलाई (छत्तीसगढ़)

मालती काम पर देर से आई और आते साथ आंखों में आंसू भरके अपना दर्द बताने लगी। उसे उसके पति ने पांवों में लकड़ी से मारा था, जिसकी वजह से दोनों पैर में नीले-नीले निशान उभर आए थे….”क्यों मारा रे मालती! इतनी बेदर्दी से, क्या हो गया था?”

“कछु नहीं बाई, पी खा के आदमी को अपनी मर्दानगी दिखाने का होता है तो औरत को ही पकड़ता है…ये तो रोज का काम है, कल ज्यादाइच मर्द बना था तो ज्यादा दरद दिया…आज पोछा नई लगा पाऊंगी बाई…बर्तन मांज देती हूं!” मालती ने मिसेज सुजैन से कहा.
निम्नवर्गीय समाज और उच्च वर्गीय समाज को अपना घरेलू मामला सार्वजनिक करने में कोई हिचक नहीं होती। निम्नवर्गीय महिलाओं की पिटाई होते देख, लोगों का अक्सर यही नज़रिया रहता है, कि इनके यहां तो ये सब चलता है, और हाई सोसायटी की ऐसी बातें तो पेज थ्री की ख़बर बनती है, जिससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।  मिडिल क्लास की औरतें ही अपना दर्द छुपा कर समाज में अपनी इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद में लगी होती हैं।

‘मालती तो अपनी तकलीफ़ मुझसे कह गई, मैं किससे कहूं….’ दिल ही दिल में ख़ुद से ही बात करती मिसेज सुजैन अपने पैरों को सहलाने लगीं, जिन पर रात को बेल्ट से निशान बनाए गए थे।

8 thoughts on “कासे कहूं

    1. औह बहुत मार्मिक।औरत को सीखना होगा ईंट का जवाब पत्थर से दे और अपने स्वाभिमान की रक्षक बने।

  1. कहानी पढ़ कर मन विस्तृणा से भर गया.. क़्या संसार में राक्षस जाती के पुरुष अभी भी मौजूद है…????.. अनंत सहानुभूति है उन सशक्त महिलाओं से 🙌🙌🙌

  2. आज भी समाज में ऐसे राक्षस मौजूद हैं।
    नारी अपनी अस्मिता और अस्तित्व का संघर्ष हमेशा से कर रही है।
    अच्छी कहानी।

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