
निशा संजय डांगे नायगांवकर, प्रसिद्ध लेखिका, पुसद
आँखों में उफनते समंदर को
बाँध देती है,
दिल में उमड़ने वाला सैलाब
रोक देती है।
दबाए रखती है
ज्वालामुखी अपने अंदर,
समाए रखती है
पूरा ब्रह्मांड अपने भीतर।
उसके ज़ेहन में
घूमती हैं अनगिनत बातें,
उसकी नस-नस में
दौड़ती है ख़ामोशी।
कश्मकश में बीतती हैं
उसकी बेहिसाब रातें।
उसकी ज़िंदगी में
आए पुरुष –
पिता, भाई, पति, बेटा,
उनका दुख-दर्द,
उनकी बुराइयाँ,
उनकी कहानियाँ,
उनके कई राज़,
सीने में दफ़्न
करते-करते उसका सीना
कब्रिस्तान बनता है।
फिर भी………..
पुरुष कहते हैं –
औरत के पेट में कोई बात नहीं छिपती।
बहुत खूब
जी बहुत बहुत शुक्र
निशा जी आपने स्त्री की व्यथा सहजतासे वर्णन की है!
बहुत बहुत शुक्रिया