
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
दीवारें जब बोल उठीं… दीवारों के भी कान होते हैं हमने सुना है, किंतु पता है दीवारें बोलती भी हैं। सिर्फ दीवार ही क्यों, हर बेजान चीज जब आपसे बात करने लगे तो वह पल अपने आप में बहुत अद्भुत होते हैं। इन्हीं पलों को मैंने कुछ समय पहले महसूस किया।
दीवारें सिर्फ मकान का ही हिस्सा नहीं होतीं। वह हमारे हर किस्से का भी हिस्सा होती हैं। हमारे एहसासों की जुबां होती है। दीवारें आपके बचपन, लड़कपन और जवानी की साझेदार व राजदार होती हैं। जहाँ हर कदम पर आपकी मासूमियत चंचलता के साथ जवान होती है।
दीवारों का प्रेम मुझे उन तक खींच कर ले गया। समय ने चाहे कितने ही रंगों से दीवारों को रंगा हो, किंतु दीवारों पर यादों का रंग और आपका संग कभी धुंधला नहीं होता। यह मैंने तब जाना जब बदरंग पड़ी दीवारें मुझसे बातें करने लगीं। गीत गाती हुई दीवारों ने मुझे घेर लिया।
जब मैं वहाँ पहुंची, तब कुएँ से लेकर नल और सीढ़ियों से लेकर घर का दरवाजा सब में हलचल सी होने लगी। हाँ… मैंने महसूस किया। वे सब जिंदा थे। मुझसे शिकायत कर रहे थे कि… क्यों इतने लंबे समय बाद याद आई हमारी…?
मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया। मेरा एक स्पर्श ही बंद खिड़की को खोलने के लिए काफी था। अंधेरे घर का दर्द जैसे ही मैंने महसूस किया, दिल यादों से रोशन होने लगा। माँ के कमरे की खिड़की हमारी उन शरारतों की राजदार थी, जब हम देर से आते और औरों की डांट से बचने के लिए माँ को वहीं से आवाज लगाकर दरवाजा खोलने के लिए धीरे से कहते।
आज वहाँ एक सन्नाटे के साथ भागते-दौड़ते लम्हे थमे पड़े थे… पर यादें भाग रही थीं, बड़ी तेजी से। कहीं त्योहारों का शोर… तो कहीं बातों की मस्ती इतराती हुई। सीढ़ियों से चढ़कर छत पर जब गई, तो वो सुबह… वो दोपहर… वो शाम तथा वो रातें तमाम। चांद की चांदनी में गाए कितने ही गाने हवा गुनगुनाने लगी। बरसात की बूँदों में भीगते तराने आँखों को भिगोने लगे और तपती दोपहरी की फुर्सत की मस्ती दिल में हूक उठाने लगी।
धीरे से मैंने नीचे बाजार की तरफ झाँक कर देखा। पनवाड़ी की दुकान, सरदार जी की लस्सी वाली दुकान, चाय की दुकान सब नदारद। हनुमान जी का मंदिर व गली के किनारे पर बना काली जी का मंदिर भी गायब। दोनों ही मंदिरों की घंटियों की आवाज कानों में गूंजकर दिल में बेचैनी सी उठाने लगी।
तभी भीतर की दुनिया से एक आवाज़ आई, “अरे… हमारी बॉल नीचे चली गई… तीन माले से फुर्ती से भाग कर नीचे जाना और नीचे से बॉल फेंकना फिर हमारा उसे लपक कर कैच करना गजब का था।” अचानक ही एक बॉल मेरे पाँव से आकर टकरा गई। एक बच्चा कौतुहल भरी निगाहों से मुझे देख रहा था।
मैंने आँखों के आँसू पोंछ कर मुस्कुराते हुए उसकी तरफ बॉल फेंक दी। मेरा बचपन मेरे सामने खड़ा था। कितना भी समय बीत जाए, पर बचपन वही रहता है—वही शक्ल, वही शरारत लिए। बचपन की हकीकत जब दीवारें मुझे सुना रही थीं, तब मैं हर पल उन एहसासों को फिर से जी रही थी।
मेरे लब गुनगुना उठे… दीवारों से मिलकर अच्छा लगता है… क्योंकि दीवारें सांस लेती हैं, बातें करती हैं, स्वागत करती हैं… प्रेम से… प्रेम का…
बेहतरीन अभिव्यक्ति 👌👌