स्वाद, संस्कृति और संघर्ष की एक ख़ामोश दास्तां
भारत की आत्मा अगर विविधता है, तो उसकी सांसों में जो सुगंध बसी है वह है चाय की खुशबू.और जब चाय की बात आती है, तो असम का नाम सबसे पहले ज़ुबां पर आता है. वो हर चुस्की जो हमारी थकान को हर लेती है, वो सुबह-सवेरे उठने की आदत को आदर्श बना देती है, वो दफ्तर की थकन या दोस्तों की गपशप को सार्थक कर देती है उसमें कहीं न कहीं असम की मिट्टी, वहां की नमी, वहां की मेहनत शामिल होती है.
असम: एक चाय की दुनिया
भारत के उत्तर-पूर्वी कोने में बसा असम राज्य, सिर्फ ब्रह्मपुत्र की वादियों और राइनो की धरती के लिए नहीं, बल्कि अपनी चाय की बगानों के लिए भी विश्वप्रसिद्ध है. यहां की चाय का स्वाद गाढ़ा, तीव्र और विशिष्ट होता है जो एक बार ज़ुबान पर चढ़ जाए, तो आम चाय फीकी लगने लगती है.कैमेलिया सिनेंसिस नामक पौधे से उपजी असम की चाय, न केवल स्वाद की दृष्टि से बल्कि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है.
इतिहास की पत्तियॉं पलटें तो…
१९वीं सदी की शुरुआत में जब ब्रिटिश व्यापारियों ने चीन से चाय मँगाना महंगा और अस्थिर समझा, तब उन्होंने भारत को देखा. और भारत ने उन्हें असम दिया चाय के लिए एक स्वर्ग्.१८३७ में असम में पहली बार चाय की खेती वाणिज्यिक स्तर पर शुरू हुई, और तब से अब तक यह उद्योग ना सिर्फ पनपा, बल्कि करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार बन गया.असम की मिट्टी में क्या है खास?
असम का उष्णकटिबंधीय मौसम
ब्रह्मपुत्र घाटी की उर्वर मिट्टी
वर्षा से सिंचित हरियाली
और सबसे महत्वपूर्ण मेहनती किसान
यह सब मिलकर असम की चाय को विश्व में विशेष स्थान दिलाते हैं
बगानों से कप तक: एक लंबी यात्रा
किसी चाय के प्याले तक पहुंचने से पहले वह कई चरणों से गुजरती है बीजारोपण, सिंचाई, तोड़ाई, सुखाना, ऑक्सिडेशन, और फिर पैकिंग्. असम की महिला मज़दूरों की निपुण उंगलियां जब सुबह-सुबह कोहरे में भीगते पत्तों को तोड़ती हैं, तब ही जाकर हमें वह एक कप सुगंधित चाय मिलती है.संघर्ष भी कम नहीं
इस स्वाद के पीछे पसीने की कई परतें हैं मज़दूरों को अब भी न्यूनतम मज़दूरी के लिए संघर्ष करना पड़ता है.जलवायु परिवर्तन का असर उत्पादन पर भी पड़ रहा है.
अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में प्रतिस्पर्धा और मूल्य निर्धारण की अनिश्चितता भी चुनौती बनी हुई है.लेकिन हर बार असम इन चुनौतियों से उबरता है क्योंकि यह केवल उद्योग नहीं, असम की आत्मा है.
आज की चाय: कल की उम्मीद
असम की चाय अब केवल एक पेय नहीं रही. यह पर्यटन, संस्कृति, लोककथाओं और आत्मसम्मान का प्रतीक बन गई है. आज कई चाय बागानों में टी टूरिज़्म को बढ़ावा मिल रहा है, जहां सैलानी बगानों में रुकते हैं, तोड़ाई में भाग लेते हैं और स्थानीय व्यंजन के साथ चाय का आनंद उठाते हैं
एक प्याली में देश की एकता
भारत की हर गली, नुक्कड़, घर और दफ्तर में चाय को लेकर एक प्रेम है एक समान आदत, जो हमें जोड़ती है. और इस प्रेम की जड़ें कहीं गहराई में असम की धरती में दबी हैं.तो अगली बार जब आप चाय की चुस्की लें, तो ज़रा कल्पना कीजिए आप ब्रह्मपुत्र की घाटी में खड़े हैं, सुबह की हल्की धूप है, बगानों में हरी चाय की पत्तियां ओस से भीगी हैं, और दूर कहीं एक हल्की सी आवाज़ आती है.
एक और कप बना दूं?

डॉ. वर्षा महेश, प्रसिद्ध लेखिका
आईआईटी पवई, मुंबई