सोचती हूं कि क्यों ऐसा हो रहा है आजकल,
कि तुम ही तुम होते हो ख़यालों में हर पल…
क्यों न ऐसा कुछ बन जाऊं कि तुम्हारे आसपास रह सकूं हमेशा..?
दिल करता है कि बन जाऊं वो काग़ज़…
जिस पर लिखते हो सब दिल की बातें तुम।
वही, तुम्हारी मेज़ पर पड़े-पड़े…
देखती रहूं तुम्हें मैं —
कभी सोचते हुए,
कभी ख़यालों में डूबे हुए,
कभी ग़मों को सहलाते हुए,
और कभी अपने आप में ही मुस्कुराते हुए…
कुछ लिखने से पहले,
एक नज़र तो देखोगे मुझे तुम…
काफ़ी है उतना मुझे जीने के लिए।
बस कभी ख़ुद से नाराज़ होकर फेंक न देना मुझे,
कहीं मरोड़कर या फाड़कर…
या यूं करती हूं —
कलम ही बन जाती हूं तुम्हारी…
मैं ही पढ़ पाऊंगी न फिर तुम्हारे
ख़यालों को सबसे पहले,
लिखने से भी पहले… है ना?
या बन जाऊं ऐनक तुम्हारी?
बैठी रहूंगी फिर कभी नाक पे,
या कभी माथे पर तुम्हारे…
या बन जाऊं साया तुम्हारा?
या सुकून? या स्याही?
या कॉफी का कप?
या हल्की सी मुस्कान?
या कोई ख़याल —
जिसमें डूबे रहते हो तुम घंटों तक…?
नहीं…
ख़्वाहिश यही है कि —
ख़्वाहिश यही है कि बन जाऊं वो अश्क,
जो तुम्हारी आंखों में झलकता है,
और तुम बख़ूबी छुपा लेते हो उसे।
गिरने नहीं देते किसी के सामने,
नज़र नहीं आने देते किसी को,
बड़ा सम्भाल कर,
जतन से…
दिल के किसी कोने में महफ़ूज़ रखते हो…
ख़्वाहिश यही है…
बन जाऊं वही अश्क —
साथ भी रहूं, और नज़र भी न आऊं।
ख़्वाहिश यही है…
कहो, क्या इजाज़त है?
कहो…

शिल्पा सिन्हा, प्रसिद्ध लेखिका औरंगाबाद