आधा केक, पूरी खुशी

चन्द्रवती दीक्षित, करनाल (हरियाणा)

सुहानी” के दामाद “रघु” का आज जन्मदिन था।
बेटी “दिशा” अपने पति के साथ मध्यप्रदेश में रहती है। छोटे बहन-भाई ने ज़िद की कि हम जीजा जी का जन्मदिन अपने घर, हरियाणा में भी मनाएँगे। दिशा के पिताजी केक ले आए।

रात को जब केक काटने लगे तो माँ ने कहा,
“थोड़ा-सा केक पड़ोस के ‘शिवा’ के घर भी दे आना।”

यह सुनते ही छोटा भाई “केशव” रूठ गया और किसी को भी केक देने से मना करने लगा। घरवालों के समझाने पर भी वह नहीं माना और बिना केक खाए ही सो गया।

अगली सुबह जब केशव उठा तो वह सुबह की सैर पर निकल गया। रास्ते में उसने देखा कि सड़क किनारे काम कर रहे मजदूरों के बच्चे एक बिस्किट के पैकेट को बड़े प्रेम से आपस में बाँटकर खा रहे थे। बस फिर क्या था-केशव के लालची मन का कोहरा झट से छँट गया।

कुछ देर तक वह उस प्रेमपूर्ण दृश्य को निहारता रहा। पूरे रास्ते लौटते समय वही दृश्य उसकी आँखों के सामने चलता रहा। घर पहुँचते ही उसने परिवार के सभी सदस्यों से हाथ जोड़कर माफी माँगी और आगे से ऐसी गलती न करने का प्रण लिया।

उसकी खुशी तब दोगुनी हो गई, जब वह अपने हिस्से के केक का आधा हिस्सा उन बच्चों में बाँटकर आया, जिनकी वजह से उसे जीवन का एक अनमोल सबक मिला था।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *