रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
मैं हूँ श्रेया.
जयपुर में एक किराये के बड़े से घर में रहती थी. घर दो हिस्सों में बँटा था एक हिस्से में फैमिली रहती थी और दो कमरे छात्रों को किराये पर दिए हुए थे. नीचे वाले हिस्से में रहती थीं अम्माजी. पूरे घर की मालकिन.
उम्र लगभग 80-85 साल. लेकिन क़द, काठी और रौब आज भी ज़बरदस्त. आवाज़ ऐसी कि एक बार लगातीं पूरे घर में गूँजती. अकेली रहती थीं. एक बेटी दिल्ली में, दूसरी पास में जो एक बड़े स्कूल की प्रिंसिपल थी. अम्माजी ने भी कई साल स्कूल में पढ़ाया था और एजेंट भी रहीं, इसलिए हिसाब-किताब में बहुत पक्की थीं. एक बेटा भी था जो विदेश में बस गया था.
इतने बड़े घर में वह अकेली रहतीं किरायेदारों के बीच. मुझे वहाँ शिफ़्ट हुए एक महीना हुआ था. वह हर थोड़ी देर में आवाज़ लगातीं और कुछ न कुछ कहतीं. मैं उनकी उम्र का लिहाज़ करते हुए हमेशा प्यार से जवाब देती. हमेशा हल्के रंग की सूती साड़ी में बहुत अच्छी लगती थीं. उनके पति भी थे, जो अधिकतर गाँव में ही रहते थे. कभी-जैपुर, कभी-गाँव यह मुझे साल भर बाद पता चला.
वह हमेशा अपनी दोनों बेटियों और बेटे बबलू की बातें करती थीं. समय की बहुत पक्की. रात 9 बजे के बाद किसी को घर में नहीं. दरवाज़ा . इसी लिए छात्र ज़्यादा दिन टिकते नहीं थे. मैं कईयों को सुबह में आकर शाम तक ही कमरा खाली करते देखती थी.
उनकी आवाज़ में ऐसी सख़्ती थी
रहना है तो मेरे हिसाब से रहो, नहीं तो कमरा खाली कर दो!
मुझे बहुत अच्छा लगता था इतनी उम्र में भी इतनी स्ट्रॉन्ग.
आस-पड़ोस वालों से पता चला कि बेटे से बहुत प्यार था, पर उसने लव मैरिज की थी इसलिए अम्माजी ने बहू को कभी स्वीकार ही नहीं किया. बेटा जापान में रहता था और जब साल में एक-दो बार आता भी था तो बस अम्माजी को देख कर चला जाता. अम्माजी ने अपने बेटे के परिवार से कोई रिश्ता नहीं रखा.
धीरे-धीरे उनसे मेरी दोस्ती-सी हो गई.
पर मैंने कभी उनसे किसी बात की तह नहीं पूछी.
वह बहाने से मुझे बुलातीं. मेरा हाथ पकड़ कर कोई पुराना गाना गुनगुनाने लगतीं. कहतीं मैडम, बात कर लिया करो, अच्छा लगता है. कभी किसी की कहानी सुनातीं, कभी कोई किस्सा. मैं भी मुस्कुराकर सुन लेती थी.
दुकानदार, पड़ोसी सब कहते
ग़ज़ब है कि आप इतने दिन उनके मकान में रह पाईं वहाँ तो कोई ज़्यादा दिन टिकता ही नहीं!
एक बार दिवाली पर घर जाने के लिए हम निकलने ही वाले थे कि अचानक अम्माजी के चिल्लाने की आवाज़ आई. घर में भागकर देखा अम्माजी बाथरूम में गिर गई थीं. बड़ी बेटी को फोन किया. फिर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. ऑपरेशन हुआ पाँव में चोट थी. दोनों बेटियों ने बहुत सेवा की अपना घर भी सँभाला, और माँ को भी. मैं भी रोज़ जाती थी. दवा देना, एक्सरसाइज़ कराना मेरा ही काम बन गया था. वह ज़िद करके कहतीं मैडम, एक्सरसाइज़ तो तुम ही करवाओगी!
कभी-कभी भी होती, पर ज़्यादा थी इसलिए कर देती. बेटा भी आया हर बार की तरह बस एक दिन के लिए और फिर चला गया. मैं वहाँ कुल चार साल रही. फिर मुझे दूसरे शहर जाना था. घर और अम्माजी दोनों वहीं रह गए.
पर अम्माजी आज भी फोन करती हैं.
एक पुराना वाला मोबाइल उसमें से डायरी खोले हुए कोई नंबर ढूँढ कर कॉल करतीं. बहुत दिनों से कॉल नहीं आया था मुझे बेचैनी होने लगी कि कहीं नंबर खो न गया हो. एक दिन मैंने उन्हें फोन किया. आवाज़ सुनकर सुकून हुआ.
मैंने कहा-अम्माजी, आज गाना नहीं सुनाएँगी?
वह तुरंत खिल उठीं.
और वही पुराना गाना
तुम जब याद आए बहुत याद आए….
और मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गई.
यह रिश्ता आज भी है.
और जब तक वह इस दुनिया में हैं
यह सिलसिला चलता रहेगा.
कुछ रिश्ते अजीब होते हैं पर दिल के करीब होते हैं।