विरह

शिखा खुराना कुमुदिनी, प्रसिद्ध लेखिका, नई दिल्ली

निशा की चुप्पी ओढ़े बैठी, चाँदनी में भीगी ये काया।
प्रियवर की बाट जोह सजती, सावन ने भी प्रेम बरसाया।

ओस बूँदों से गूंथ रही मैं,आशाओं के मोती हार।
मन की लाली पलकों में भर आई, अंखियों में लिए इंतज़ार।

कब आओगे प्रियतम तुम, कबसे श्रृंगार किये बैठी हूं।
हृदय की तीव्र तृष्णा में प्रिय की छवि लिए बैठी हूं।

बावरी सी डोल रही उपवन में, महक उठा है मेरा अंग-अंग।
तुम नहीं हो सम्मुख फिर भी, तुम ही हो मेरे संग-संग।

विरह वेदना भी मीठी लगती है,जब भीतर हो नित अनुराग।
तुम्हारी ही खातिर सजती हूं साजन, अंग अंग मेरा गाए फाग।

बूंदों की बिंदिया है सजाई, सूरज का आंचल है ओढ़ा।
कौन देखे साज-श्रृंगार ये, बखान कर दो पी तुम थोड़ा।

पलकों पर सपने संजोए ,केशों में बांधे किरणों की डोर।
बिना निमंत्रण ही आती हूं, हर दिन इस उपवन की ओर।

3 thoughts on “विरह

  1. केशों में बांधे किरणों की डोर… बहुत खूब शिखा जी👏👏

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