हस्‍तरेखा

डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन

मैया, कुछ लाओ बाबा के लिए ……….’’
दरवाजे पर गेरूए कपड़े में एक साधु बाबा खड़े थे।
जिन्हें देखकर वह झट अंदर के कमरे में चली गई।

‘‘बाबा, अब की बार बहुत दिनों बाद आ रहे हैं?’’
‘‘हाँ, काशी-बनारस गए थे मैया ………..’’

‘‘अभी बिटिया अंदर गई, उसको बुलाओ ज़रा, भविष्य बताऊंगा।’’

मां के बार-बार आवाज़ लगाने पर वह बाहर नहीं आयी।
वह कभी किसी को अपना हाथ नहीं दिखाती थी,
भविष्यवाणी पर उसे विश्वास नहीं था।

मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने अपना हाथ फैलाया।

‘‘अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब राज करेगी।
घर-बार, पैसा-कोड़ी, अच्छा पति—सब मिलेगा।’’

उसने बीच में ही टोककर पूछा—
‘‘विद्या की रेखा मेरे हाथ में कहाँ पर है, बताइए तो जरा?’’

‘‘वो तो कहीं से कहीं तक दिखाई नहीं दे रही बिटिया।
तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।’’

‘‘बाबा, एक दिन विद्या की रेखा उकेर कर दिखाऊंगी—
हाथ पर नहीं, माथे पर।’’
इतना कहकर वह अंदर चली गई।

आज बैठे-बैठे उसे सब याद आ रहा था।
उसके हाथ में आमंत्रण पत्र था—
बहुत सारे विषयों में उपाधि प्राप्त करने पर
वह सम्मानित होने जा रही थी।

अपनी हथेली खोलकर अब वह देख रही थी
अपनी विद्या की रेखा को बार-बार………….

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