
डॉ. ऋषिका वर्मा,गढ़वाल (उत्तराखंड)
बदल रहा है भारत मेरा, नवयुग की पहचान लिए,
नवोन्मेष के पंख पसारे, हर सपना साकार किए।
गाँवों में अब इंटरनेट है, खेतों में मशीनें हैं,
ज्ञान की नदियाँ बहती हैं, बच्चों की आँखों में सपनें हैं।
जहाँ कभी चूल्हे धुएँ से भरते थे घर-आँगन में,
अब हर रसोई में गैस की लौ, उजियारा बन गई है।
किसान अब मौसम जाने, ऐप से जोतें खेत है वो अब,
डिजिटल मंडी लाए भाव, मेहनत अब कम करते किसान।
मेट्रो की रफ्तार सी तेज़, बढ़ती है अब सोच यहाँ,
स्टार्टअप से उगता सूरज, नये उद्यम का अवसर जहां,
बेटियाँ अब चाँद छूती हैं, सीमा पर भी जाती है वो,
ना डर, ना बंधन, बस हौसले, हर मंज़िल को पाने का जज्बा।
स्वच्छता का पर्व चल पड़ा, हर गली, हर द्वार,
नदियाँ पुकारें निर्मल जल से, जागा है अब संसार।
हर हाथ को काम मिले, हर मन का हो सम्मान,
नवभारत की रचना में है, हर जन की पहचान।
संविधान की छाया में, सबको मिले अधिकार,
सद्भाव, समरसता बनें अब, भारत का श्रृंगार।
भाषा, रंग, वेश के फर्क, अब दूरी ना लाएँ,
एकता के रंग में रच-बस, नये इतिहास बनाएँ।
बदल रहा है भारत मेरा, सूरज बन हर क्षितिज पे,
उम्मीदों की रोशनी लेकर, बढ़ रहा है नित्य नवीन पथ पे।
हम ऐसे ही उन्नति के पथ पर अग्रसर होते जाएंगे,
अपने भारत को एक दिन विश्व मंच पर गर्व कराएंगे।