सभी जान-बूझ कर
क्यों पाल लेते हैं
गलतफहमियांँ
ये सभी जानते हैं
जीवन बर्बाद कर देती हैं
ये गलतफहमियां
अपनों को अपनों से दूर कर देती हैं
इसकी चक्की के
दो पाटों के मध्य
पिस जाते हैं रिश्ते-नाते
कुछ मधुर अहसास
बहुत से अरमान
मधुर-संबंध
और तो और
कुछ अबोध बालक
कुछ मज़बूत रिश्ते
लाचार बुज़ुर्ग
जो स्नेह की एक ही डोर से
सबको बांधे हुए थे
मज़बूत हाथों से थामे हुए थे
गलतफहमियांँ…
ये वो आग है जो
जो बिना लगाए ही
सब भस्म कर देती है
रिश्ते- नाते सब कुछ।।

निरुपमा सिंह
प्रसिद्ध साहित्यकार, बिजनौर
जानते सब है पर अफसोस के समझते नही है
कई गलतफहमियों से जिंदगी बीत जाती है।
कई गलतफहमियों से रीत जाती है।।
अत्यन्त सुन्दर एवं कटु सत्य का चित्रण करती रचना के लिए साधुवाद मेरी प्रिय मित्र!