तो अच्छा होता

तो अच्छा होता – दर्द और इंतज़ार की प्रेम कविता

गायत्री बंका, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

काश तुम आते तो अच्छा होता,
इंतज़ार न कराते तो अच्छा होता.

इंतज़ार का फल मीठा होता है,
मगर तुम भी चखते तो अच्छा होता.

मुहब्बत जताकर भूल बैठे हो,
यूँ न तड़पाते तो अच्छा होता.

कहकर गए थे मरते हैं तुम पर,
गैरों की बाहों में न जाते तो अच्छा होता.

2 thoughts on “तो अच्छा होता

  1. क्या बात गायत्री जी । आप भी कुछ वक्त हमारे साथ बिताते तो अच्छा होता ।

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