रेडियो स्टेशन पर खामोश होते लम्हे

दौर के विविध भारती स्टेशन पर ‘हमारे मेहमान’ कार्यक्रम के लिए रिकॉर्डिंग तो सिर्फ आधे घंटे चली, लेकिन जब फांसी की पुरानी घटना का जिक्र हुआ, तो माहौल एकदम बदल गया। एनाउंसर सुधा शर्मा जी गीत के बीच अचानक मौन हो गईं — “रहे ना रहे हम, महका करेंगे…” गीत की पंक्तियाँ जैसे कमरे की संवेदना में घुल गईं।
जब मैंने 1996 में उज्जैन सेंट्रल जेल में देखी गई फांसी की घटना सुनानी शुरू की, तो सुधा जी की आँखों से आंसू बहने लगे। वे रुमाल से आँखें पोंछतीं, लंबी साँस भरतीं और कहतीं, “हां भाई साब, आगे बताइए…”
उनका हर सवाल—“सच में देखा?”, “डर नहीं लगा?”, “नींद आ गई थी उस रात?”—एक गहरी संवेदना और जिज्ञासा से भरा था। इंटरव्यू से ज़्यादा वक्त उस घटना की परतें खोलते हुए बीता।

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प्रयागराज-सा संगम मन

कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जो कही नहीं जातीं, लेकिन दिल की गहराइयों में अनवरत बहती रहती हैं — सिसकती हुई, दबी हुई, फिर भी महसूस होती हुई। ये धड़कनों में छिपे वो एहसास हैं जो न पूरी तरह अव्यक्त हैं, न पूरी तरह अभिव्यक्त। दिल मानो एक ऐसा प्रयाग है जहाँ हर भावना, हर याद, हर संबंध एकत्र हो जाता है — जैसे गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम।हाल ही में जन्मे एक मासूम से इश्क़ ने मन को कुंभ की तरह भीगो दिया है — वह भी मौन में, तप में, जल में और हवा के हर स्पर्श में। तेरी उपस्थिति जैसे हर तत्व में घुल गई है। इस भावनात्मक संगम में अब प्रेम और भक्ति एकसाथ बह रहे हैं। मन जैसे प्रयागराज बनकर इंद्रियों में शंखनाद कर रहा है — बुला रहा है, कि अब इस प्रवाह में तुम भी आ जाओ।

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जीना इसी का नाम है..

क्या जीवन में सहज हो जाना वास्तव में इतना आसान होता है? क्या गिरकर, रोकर चुप हो जाना सरल होता है? कुछ पाकर उसे खो देना, कठिन समय में भी मजबूत बने रहना — यह सब आसान नहीं होता। खासकर एक स्त्री के लिए, जो सही होते हुए भी चुपचाप गलत सुनी जाती है, मूक रह जाती है। फिर भी, स्त्रियाँ यह सब सहती हैं, चोट खाकर भी मुस्कुराना सीख जाती हैं। उनके लिए जीना बस यूँ ही गुनगुनाते हुए आगे बढ़ते रहना है, क्योंकि असल में — जीना इसी का नाम है।

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धारा और संकल्प

कंकड़ और पत्थरों ने मिलकर नदी की दिशा मोड़ने का संकल्प लिया। उन्होंने उसके प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाए, टीले खड़े किए और पहाड़ बनने का सपना देखा। लेकिन नदी – जो स्वयं प्रवाह की देवी है – न रुकी, न झुकी। वह ठोकरें खाती रही, पर हर बाधा के पार एक नया मार्ग खोजती रही। अपनी गति को कभी न छोड़ते हुए, उसने प्यासों को जल, खेतों को हरियाली और जीवन को उम्मीद दी। अंततः, जब सारे पत्थर थक गए और टीले मिट्टी बन गए, नदी अपनी मंज़िल — समुद्र — तक पहुँच गई। उसने सिद्ध किया कि उसे रोका जा सकता है थोड़ी देर के लिए, पर हमेशा के लिए नहीं। क्योंकि उसका अस्तित्व ही बहते रहने में है।

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तुलसीदास: एक ताने ने जिसे बना दिया युगों का संत

भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में जब भी भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य की बात होती है, गोस्वामी तुलसीदास का नाम श्रद्धा और गौरव के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक संत, एक कवि और एक भक्त थे, बल्कि आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे युगपुरुष भी थे जिन्होंने अपनी रचनाओं से भारतीय समाज की आत्मा को गहराई से स्पर्श किया.
लगभग 500 वर्ष पूर्व भारत में मुगल शासन की नींव पड़ चुकी थी. इसी काल में उत्तरप्रदेश के बांदा ज़िले के ग्राम राजापुर में रामबोला नामक बालक का जन्म हुआ.

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कसक

वह किसी रहस्य की तरह प्रतीत होती है, मानो स्वयं वेदों में समाई कोई दार्शनिक व्याख्या हो। उसके नयन ऐसे हैं जिनके रहस्य को समझना किसी साधक के लिए भी सहज नहीं। बिखरी-बिखरी लटों पर वह कोई सजावट नहीं चाहती — उसकी मासूम मुस्कान ही इतनी मोहक है कि सीधे हृदय को छू जाती है। जब उसकी नजरें उठती हैं, लगता है मानो पूरा आकाश थम जाए; उसकी उपस्थिति ही किसी धर्मवीर की मनोकामना जैसी लगती है।हर रूप में जैसे कोई अमृत की झलक छिपी हो, और हर मौन में किसी कवि ‘चंदर’ की संवेदना समाई हो।

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बहुचर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड पर अब फिल्म बनेगी

इंदौर के बहुचर्चित राजा रघुवंशी हत्याकांड पर अब फिल्म बनने जा रही है। फिल्म का नाम फिलहाल ‘हनीमून इन शिलॉन्ग’ रखा गया है, जिसका निर्देशन करेंगे एस.पी. निंबावत। मंगलवार को वे इंदौर पहुंचे और राजा रघुवंशी के परिजनों से मुलाकात कर अधिकारिक अनुमति ली।

परिवार को उम्मीद है कि इस फिल्म के ज़रिए मेघालय की बिगड़ी हुई छवि सुधरेगी। फिल्म की 80% शूटिंग इंदौर में और 20% शूटिंग शिलॉन्ग में की जाएगी।

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अहसासों के कतरन…

हम अपने आप में बस एक पानी की बूँद जैसे हैं। कभी मिट्टी पर गिरकर उसमें समा जाते हैं, तो कभी किसी पत्ते पर टिककर उसकी शोभा बढ़ाते हैं। और जब लहरों से मिलते हैं, तो खुद सागर का रूप ले लेते हैं। हमारी पहचान इस पर नहीं है कि हम कौन हैं, बल्कि इस पर है कि हम किससे जुड़ते हैं।

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किस विध लूँ तेरी थाह

यह कविता एक गहरी, रहस्यपूर्ण और रूमानी अभिव्यक्ति है — प्रेम में डूबे एक हृदय की उस छटपटाहट और जिज्ञासा की, जो अपने प्रिय की भावनाओं, मौन संकेतों और अस्तित्व को पूरी तरह समझना चाहता है। शीर्ष पंक्ति “किस विध लूँ तेरी थाह प्रिय” पूरे काव्य का केंद्रीय भाव है — यह प्रश्न नहीं, एक आकुल जिज्ञासा है, एक समर्पण है।

कविता में प्रिय को एक ऐसी नदी के रूप में देखा गया है, जो सतह पर तो लहराती, मुस्कराती, बलखाती दिखती है, लेकिन भीतर कहीं गहराई में कई सदियों से प्यासेपन की पीड़ा को संजोए हुए है। वह प्रिय किसी दरिया से मिलन नहीं चाहता, फिर भी एक अनकहा प्रवाह है, जो उसे बहाए लिए जाता है — यही वह विरोधाभास है जिसे कवि समझना चाहता है।

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हौसले की लौ…

यह कविता आत्मबल, साहस और जीवन संघर्षों के बावजूद आगे बढ़ते रहने की एक सशक्त अभिव्यक्ति है। इसमें कवि अपने जीवन की यात्रा को एक पर्वतारोहण की तरह प्रस्तुत करता है, जहां रास्ता कठिन है, पर मंज़िल की चाह अडिग है।

प्रारंभिक पंक्तियाँ प्रेरणादायक हैं — आँधियों और तूफानों को भी मात देने वाले उस ‘हौसले के दिए’ की बात होती है, जो अंधेरे में भी मार्ग दिखाता है। इसके बाद कविता सपनों की उड़ान की बात करती है, और बताती है कि थकना, रुकना या पीछे हटना विकल्प नहीं है।

यह एक ऐसा जोश भरा गीत है, जो संघर्षों को गीतों में पिरोकर उन्हें प्रेरणा में बदल देता है। वक्त ने चाहे कितनी भी सख्ती दिखाई हो, लेकिन वक्त ही नई रोशनी भी लाएगा — इस उम्मीद को कवि ने ‘नूर’ और ‘दीप’ जैसे प्रतीकों से दर्शाया है।

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