
श्वेता सिंह प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई
जान को जान समझा, जान ने मेरी जान ले ली।
सड़क पर पकड़ा हाथ मेरा, ज़ोर से झकझोर दिया।
हम कुछ न कह सके, बस लोगों को देखते रहे।
जब जड़ा गाल पर थप्पड़ मेरे, हम अपनी मोहब्बत को कोसते रहे।
प्यार करने की सज़ा अब मुझे समझ में आ रही थी।
अब ये किससे कहें, गलती मेरी मुझे समझ में आ रही थी।
मोहब्बत ये कमबख्त मुझे रुलाए जा रही थी।
सड़क पर थप्पड़ खाने की ज़िल्लत अब मुझे सताए जा रही थी।
ज़हर खाऊँ या फाँसी लगाऊँ, दिमाग में मेरे ख़याल आ रहा था,
फिर मेरा बाप मुझे बहुत याद आ रहा था।
पापा ने कहा था, “मैं बाप हूँ तुम्हारा, किसी भी परेशानी को मुझे बेख़ौफ़ होकर बताना।”
अब क्या बताएं, बेटी आपकी बर्बाद हो चुकी है; आपकी बात न मानने की सज़ा वो थप्पड़ से खा चुकी है।
छोड़ो, जाने दो पापा, अब कुछ नहीं हो सकता।
तुम्हारी इज़्ज़त में जो हमने दाग लगा दिया, वो धो नहीं सकता।
माँ ने मुझे बड़े प्यार से पाला, आपने कंधे पर बिठाया,
किसी चीज़ की कमी का एहसास न दिलाया।
अब क्या कहूँ, कुछ कह नहीं सकती, माँ-बाप के प्यार का ऋण दे नहीं सकती।
आज जब ज़हर खा रही हूँ, उस लड़के को बहुत कोसे जा रही हूँ।
मेरे माँ-बाप से भी दूर कर दिया उसने,
ये कदम उठाने पर मजबूर कर दिया उसने।
जिस बाप के कंधे पर बैठी थी,
अभी उन्हीं कंधों को इस तरह दबाए जा रही हूँ।
अपनी अर्थी उन्हीं कंधों पर उठवाए जा रही हूँ।
सत्रह-अठारह साल पाला-बड़ा किया जिसने,
हर छोटी-सी चीज़ का ध्यान दिया जिसने,
उन्हीं माँ-बाप को रुसवा किए जा रही हूँ,
लोगों के सामने उन्हें शर्मिंदा किए जा रही हूँ।
अपने माँ-बाप को ज़माने के सामने एक प्रश्नचिह्न दिए जा रही हूँ,
अब उसी बात का खुद ज़हर पिए जा रही हूँ।
बहुत अच्छा