
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
युवा पीढ़ी कहते ही उन्मुक्त होकर हँसते-खिलखिलाते एक समूह की तस्वीर आँखों में उभर आती है। बेफिक्र… लापरवाह… अपने आप में मस्त रहने वाले। जियो और जीने दो के सिद्धांत को अपनाने वाले ये बच्चे वर्तमान में जीते हैं। उनकी इस बिंदासियत को गैर-जिम्मेदारी समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।
हम हमेशा से कहते-सुनते आए हैं कि “ताली हमेशा दो हाथों से बजती है”, पर आज का युवा कहता है . ताली न सही, एक हाथ से चुटकी तो बजती है। इसी कारण आज की जनरेशन हाय-फाय में ज़्यादा विश्वास रखती है। मैं इसे इस तरह लेती हूँ कि एक हाथ हमारा और एक हाथ तुम्हारा; और दो हाथों के साथ-साथ दोनों के विचार भी मिलकर एक हो जाते हैं।
आज के बच्चे बहुत जल्दी दूसरों को जैसे वे हैं, वैसे ही स्वीकार कर लेते हैं। वे उनसे जुड़कर उनकी ताकत बनने में विश्वास रखते हैं। वे संचित नहीं करते, बल्कि बाँटने में बहुत दिलदार होते हैं, क्योंकि वे वर्तमान में जीते हैं। उनकी सोच समय के साथ कदम बढ़ाने की होती है। अपने शौक कम करने की बजाय, वे शौक पूरे करने के लिए संसाधन कैसे बढ़ाए जाएँ इस पर यक़ीन करते हैं।
हर परिस्थिति में खुद को ढालना उन्हें बखूबी आता है और हर समस्या का समाधान वे चुटकियों में सुलझा लेते हैं। अपनों से दूर रहकर भी घर-परिवार की ज़िम्मेदारियाँ अकेले निभाते हैं और कभी उफ़ तक नहीं करते।
अतीत ही वर्तमान को जन्म देता है। आज का युवा अगर गुमराह है, तो कहीं-न-कहीं हमारी परवरिश में कमी रह गई है। हम शायद उन्हें सही दिशा नहीं दे सके। हमने उनकी दशा नहीं समझी, तभी वे दिशाहीन होकर लक्ष्यहीन हो गए। यदि वे गुनाह करते हैं, तो गुनहगार हम भी हैं. वरना हमारे दिए संस्कार कभी इतने कमज़ोर नहीं हो सकते।
पहले जहाँ भरे-पूरे परिवार होते थे, वहाँ बड़े-बुज़ुर्ग पूरे समय बच्चों पर प्यार भरी मगर गहरी नज़र रखते थे, जिससे बच्चे हमेशा एक अनदेखे कवच में सुरक्षित रहते थे। पर आज माता-पिता खुद अपने-अपने में व्यस्त हैं। उन्हें फुर्सत ही नहीं। नतीजा यह कि जिस उज्ज्वल भविष्य के लिए वे दिन-रात खट रहे होते हैं, वही अंधकार से कब घिर जाता है उन्हें पता ही नहीं चलता।
उन पर उँगली उठाने से पहले एक बार अपने गिरेबान में झाँककर देख लें. कहीं आप ही तो नहीं चूक गए? क्योंकि संस्कार और संस्कृति हमेशा ऊँचाई की ओर ले जाते हैं। पतन तभी होता है, जब नींव कमज़ोर हो।
हर किसी के साथ ऐसा नहीं होता अपवाद हर जगह होते हैं। मैं सिर्फ़ इतना कहना चाहती हूँ कि युवा शक्ति सिर्फ़ एक ही भाषा समझती है. दोस्ती की। दोस्त बनकर, कदम से कदम मिलाकर उनके साथ चलने से आप भी उनकी ही श्रेणी में आ सकते हैं। उनके नए तेवर को फेवर करें।
मेरे ख़्याल से हर वह इंसान युवा है, जिसकी सोच युवा है. उम्र को मात देते हुए, नए कलेवर में नया फ्लेवर लिए हुए।
Sahi kaha aur samazha aapne