
बेबी को बेस पसंद है यह 2016 में सुल्तान फिल्म के आने के बाद ही नहीं हुआ कि अनुष्का शर्मा, बादशाह, विशाल डडलानी या सालमली खोलगडे के कहने के बाद ही बेबी को बेस पसंद आया हो. यह बेस कमबख़्त चीज़ ही ऐसी है कि बेबी क्या, बाबा को भी बेस पसंद है.
बेस का संबंध तो नेताओं से भी है. भले ही उनकी सामान्य आवाज़ लड़कियों जैसी हो, लेकिन माइक के सामने आते ही उनकी बाँहें तन जाती हैं और आवाज़ में गज़ब का बेस आ जाता है. कभी तो लगता हैअभी तो यह एक सामान्य इंसान की तरह बात कर रहे थे, अचानक क्या हो गया इन्हें? खैर, छोड़ोइनका अपना बेस तैयार करने के लिए आवाज़ में बेस तो लाना ही पड़ता है.
अब हम अपनी बेस की बात करते हैं. यह उस दौर की बात है, जब रेडियो पर फरमाइशी गानों का दौर धीरे-धीरे समाप्त हो रहा था. आकाशवाणी इंदौर पर आने वाले रविवारीय कार्यक्रम मनभावन और मंगलवार को युवावाणी में एक ही तरह के ़फरमाइशी गीतों से बौराए लोगों ने टेपरिकार्डर ख़रीदना शुरू कर दिया था. पहले मोनो (एक स्पीकर वाले) टेपरिकार्डर आया करते थे, फिर स्टीरियो आए स्पीड किंग और उसके बाद डेक. डेक ने तो तू़फान खड़ा कर दिया था. घर-घर में हो गए थे. डेक और कैसेटों की भरमार लगभग हर घर में थी.
उस दौर में भी हमारे यहाँ टेपरिकार्डर नहीं था. हमारी स्थिति ऐसी थी कि लड़की का पता नहीं और सेहरा लेकर घूमने जैसी हालत. टेपरिकार्डर नहीं था, लेकिन कैसेट ख़रीदने और भरवाने का शौक़ हो गया था. पुराने गानों की सूची बनाकर कैसेट रिकॉर्डिंग करने वाले के यहाँ पहुँच जाते थे. फिर कैसेट लेकर किसी टेपरिकार्डर वाले के यहाँ जाकर सुनते थे.
इस काम में हमारी मदद कीअशोक जाट, अशोक बंसल, बाबू पानवाला, घनश्याम अरोड़ा और लीलाधर छाबड़ा ने.
एक ज़माने में ये सभी गानों के शौकीन थे. इनके पास अच्छे क़िस्म के टेपरिकार्डर थे.
धीरे-धीरे टेपरिकार्डर आम हो गए. हमने भी एक टेपरिकार्डर ख़रीदा शामगढ़ में देशभक्त रेडियो (लक्ष्मीनारायण आलौकिक) से. कैसेट तो हमारे पास थीं ही, इसलिए टेपरिकार्डर ख़रीदने के बाद मनपसंद गाने सुनने में परेशानी तो नहीं आई, लेकिन वह मज़ा नहीं आया जो महंगे टेपरिकार्डर में आता था. इसलिए हम दूसरों के यहाँ सुनते थे, क्योंकि हमारे पास जो टेपरिकार्डर था, वह दिल्ली मेड था. उस समय दिल्ली मेड चीज़ों को दोयम दर्जे का माना जाता था.
अब परेशानी यह थी कि इसका हल कैसे निकाला जाए. शामगढ़ में मेरे मित्र हैं. गोपाल पंजाबी, पुष्करलाल जी पंजाबी के सुपुत्र. उनकी रेडियो मरम्मत की दुकान है; यह उनका पुश्तैनी व्यवसाय था. मैंने गोपाल को उस टेपरिकार्डर के बारे में बताया. उसने कहा- इसमें टकारा (जापान की एक ऑडियो कंपनी) की प्लेट डाल देंगे तो अच्छी आवाज़ आएगी. गोपाल ने प्लेट डाल दी. आवाज़ तो ठीक हो गई, लेकिन मज़ा फिर भी नहीं आ रहा था, क्योंकि वह स्टीरियो नहीं था.
इसके बाद किसी ने बताया कि एक स्पीकर लाकर यदि मटके के ऊपर उल्टा लगा दिया जाए तो आवाज़ अच्छी आती है. अब स्पीकर का जुगाड़ किया गया रणछोड़ रेडियोवाले (खारुआकला) से. उसके बाद पुराना मटका निकाला गया, जो बाई ने नहाने-धोने का पानी भरने के लिए रखा था. उसके ऊपर स्पीकर उल्टा रखा गया.
वाकई, इस एक्सपेरिमेंट ने जादू कर दिया. ग़ज़ब का बेस था. बाबूजी के स्कूल जाने के बाद तेज़ आवाज़ में गाने बजाते थे. मूड और सिचुएशन के मुताबिक क्योंकि घर से कुछ दूर रहने वाली बेबी को भी बेस पसंद था
जबरदस्त बेस👏👏 आपके और हमारे शौक हमेशा एक जैसे रहे
सुनहरी यादे 🌹
मैं भी कैसेट भरवाने में सबसे आगे। उस दौर की यादें। उफ़ !
यादों का कारवां
वाह कमाल का म्यूज़िक सिस्टम
सही कहा, बेस तो हमें भी पसंद है ।कैसेट में रिकॉर्ड करके अपने पसंद के गानों की लिस्ट रखना भी एक सुख था।कुछ तो आज भी मेरे संग्रह में है