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आसान नहीं है पुरुष होना…

सुरभि ताम्रकार ‘शावि’, लेखिका, दुर्ग

पुरुष होना कई मामलों में
स्त्रियों से ज्यादा कठिन है।
क्योंकि दुःख छुपा पाने की कला में ये अभागे रहे।
हम लड़कियों ने आँखों में काजल, लाइनर लगाकर
आँसू की छाप मिटा ली कभी,
तो अपनी मुस्कुराहट लिपस्टिक से बढ़ा ली कभी।
पर लड़कों का क्या?
पहले तो वो रोते ही कम हैं,
और दूसरा रोते हैं, तो छिपा लेने के साधन नहीं हैं
पास इनके।
आँसू से हुई लाल-गुलाबी आँखें
हर बार नींद टूट जाने का बहाना नहीं हो पाती इनके।
मुझे कभी-कभी लगता है,
विधाता ने पुरुषों को दाढ़ी इसलिए दी है
कि वे अपने दुःखों की लकीरें
थोड़ा-सा तो छुपा सकें।

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