
शारदा कनोरिया, शुभा, प्रसिद्ध लेखिका, पुणे
पुरातन काल से ही शब्द और ध्वनि हमारे जीवन का केंद्र रहे हैं। वेदों में कहा गया है, “शब्दो वै ब्रह्म”, अर्थात् शब्द ही ब्रह्म है। जब सृष्टि के प्रारंभ में ॐ का नाद गूँजा, तभी से स्वर, व्यंजन और भाषा का प्रवाह प्रारंभ हुआ। संस्कृत उस दिव्य नाद का शुद्धतम स्वरूप बनी और उसी की सहजता, सरसता और आत्मीयता से हिंदी का जन्म हुआ।
हिंदी केवल आधुनिक भाषा नहीं है, यह सनातन संस्कृति की अनवरत धारा का जीवंत सेतु है। संस्कृत जहाँ गूढ़ ज्ञान की वाहक है, वहीं हिंदी उस ज्ञान को सरल बनाकर लोकजीवन तक पहुँचाती है। यही कारण है कि हिंदी को हम संस्कृति की आत्मा और राष्ट्र की वाणी कह सकते हैं।
सनातन धर्म मात्र पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला है—सत्य, करुणा, धर्म, कर्तव्य और समरसता की सतत धारा। इस धारा को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य हिंदी ने सहजता से किया है।
तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का आदर्श लोकजीवन तक पहुँचाया।
सूरदास जी ने अपने पदों में कृष्ण की बाल-लीलाओं और भक्ति की मधुरता को अमर बना दिया।
कबीर ने दोहों के जरिए विवेक का दीप जलाकर धर्म के आडंबरों को चुनौती दी।
मीरा ने अपने भजनों से भक्ति-रस की अविरल धारा बहाई।
इन सभी संतों और कवियों ने हिंदी को सनातन संस्कृति का सशक्त वाहक बना दिया।
महात्मा गांधी ने कहा था—“हिंदी जन की भाषा है।” स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हिंदी ने सेतु का कार्य किया और विविध भाषायी समाज को एक सूत्र में बाँधा। वास्तव में, हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता, आत्मगौरव और राष्ट्र चेतना की वाणी बन गई।
हिंदी की विशेषता
हिंदी वह भाषा है जिसमें वेदों की ऊँचाई भी है और गाँव की मिट्टी की महक भी। इसमें शास्त्र का ज्ञान भी है और लोकगीत की सरलता भी। यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है—यह ज्ञान को सबके लिए सुलभ बनाती है और हर हृदय को जोड़ती है।
आज हिंदी केवल उत्सवों और अवसरों तक सीमित न रह जाए। यदि हम प्रतिदिन हिंदी बोलें, पढ़ें और लिखें, तभी यह भाषा जीवित और प्राणवान बनी रहेगी। हिंदी दिवस तभी सार्थक होगा जब यह हमारी आदत और हमारी आत्मा का हिस्सा बने।
हिंदी हमारी वाणी है, सनातन हमारी आत्मा। जब वाणी और आत्मा का संगम होता है, तभी भारत की धड़कन सजीव हो उठती है और हमारी पहचान पूर्ण होती है।
हिंदी हमारी संस्कृति की धड़कन है,
हिंदी हमारी आत्मा की भाषा है।
हिंदी के बिना भारत का अस्तित्व अधूरा है।