ये कैसा दिवस?

लेखन मेज़ पर बैठे कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद, पृष्ठभूमि में लमही गाँव और उनकी साहित्यिक विरासत को दर्शाता यथार्थवादी दृश्य।

रेणुका अस्थाना

क्या प्रेमचंद के लिए केवल एक दिन का सम्मान पर्याप्त है?

हर वर्ष हम मातृ-पितृ दिवस, हिंदी दिवस और इसी तरह कई अन्य दिवस मनाते हैं। इन्हीं में एक दिन हम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिवस भी मना लेते हैं। फिर सब कुछ समाप्त। क्या एक दिन का स्मरण उनके सम्मान के लिए पर्याप्त है?

हम कभी यह सोच भी नहीं पाते कि जिस तरह बंगाल ने रवींद्रनाथ टैगोर के गीत, संगीत, कला और साहित्य को न केवल सहेजकर रखा है, बल्कि उसे अपनी जीवनशैली में भी आत्मसात किया है, उसी तरह हमें भी अपने साहित्यकारों को सम्मान देना चाहिए। बंगाल का समाज अपने बच्चों को, आधुनिक होते परिवेश में भी, रवींद्रनाथ के प्रति सम्मान-भाव से परिचित कराता है। समय-समय पर उनके सम्मान में आयोजन होते हैं।

और हम हिंदी भाषी? हम प्रेमचंद को केवल एक दिन याद कर इतिश्री कर लेते हैं। हम यह भी नहीं सोचते कि जिस प्रेमचंद के कारण हमारा साहित्यिक संसार समृद्ध हुआ, जिसने हमें साहित्य में जीवन की संवेदनाओं को गहराई से समझना सिखाया, उनके गाँव लमही की स्थिति क्या है। वहाँ तक ठीक से पहुँचना भी कठिन है। न कोई सुव्यवस्थित व्यवस्था है, न कोई दूरदर्शी योजना। जो आयोजन होते हैं, वे भी महज़ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।

हम अपने बच्चों को सामान्य ज्ञान (जीके) की पुस्तकों के माध्यम से बस इतना याद करवा देते हैं कि “मुंशी प्रेमचंद हमारे देश के महान कथाकार थे।” फिर बच्चे आगे चलकर उन्हें भूल जाते हैं, क्योंकि हम उन्हें प्रेमचंद की कोई कहानी सुनाते नहीं, उनका साहित्य पढ़वाते नहीं। हम उन्हें यह नहीं बताते कि जैसे कोलकाता के लिए रवींद्रनाथ टैगोर, इंग्लैंड के लिए शेक्सपियर, वैसे ही हमारे लिए मुंशी प्रेमचंद हैं। उन्हें जानो, पढ़ो और पहचानो। चलो, उस गाँव को सँवारें जहाँ उन्होंने जीवन जिया। मिलकर हर वर्ष एक बड़ा साहित्यिक समारोह करें, जो केवल रस्म न हो, बल्कि संवेदना और श्रद्धा से भरा हो।

जागो! समझो! अपनी भाषा को, अपने साहित्य को और अपने लेखकों को। यही हमारी पहचान हैं। यदि हम केवल एक दिन की चाँदनी में खोकर बाकी समय अंधेरे में जीते रहेंगे, तो हमारा साहित्यिक भविष्य भी धीरे-धीरे धूमिल हो जाएगा।

हमारा देश जितने राज्यों का देश है, उतनी ही भाषाओं और साहित्य की विविधता का देश भी है। लेकिन यदि हम अपने ही प्रदेश के साहित्य और साहित्यकारों को सम्मान नहीं देंगे, उन्हें अगली पीढ़ी तक नहीं पहुँचाएँगे, तो फिर दूसरी भाषाओं और साहित्य की गहराई को कैसे समझ पाएँगे?

आज जब विश्व ‘ग्लोबल’ हो रहा है, तो हमें भी अपनी सोच और दृष्टिकोण को व्यापक बनाना होगा। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य की साझी विरासत हैं। उनका जन्मदिवस एक दिन का हो सकता है, लेकिन उनका लेखन समय के पार का सत्य है, क्योंकि उनकी कहानियाँ आज भी उतनी ही सामयिक हैं, जितनी अपने समय में थीं।

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