हर जन्म की प्यास

प्रमिला पांडेय

मैं हूॅ , मीठी नदी, ख्वाब मीठे लिए ,
चल पड़ी हूँ ,उदधि से मिलन के लिए।।

खारी हो जाऊँगी , हमको मंजूर है
प्यास मिट जायेगी हर जनम के लिए।।

मुद्दतों से दरश को भटकती रही
भर नयन कोर जल आचमन के लिए।।

 ढूंढती दर बदर भोर से सांझ तक

द्वार तुम सा मिले बस नमन के लिए।।

नेह का कर समर्पण ” प्रिया” चल पड़ी
गेह रखना खुला आगमन के लिए।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *