स्त्री : ‘एक मैनुअल’

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली (मुंबई)

आज के दौर की औरत को अपनी जिंदगी जीना किसी जटिल गणित के समीकरण को हल करने जैसा है ।
सड़क, बस, ट्रेन या ऑफिस- अगर औरत नज़रें झुका कर चले तो दुनिया उसे “आउटडेटेड”, “दकियानूसी ” और “संकुचित” घोषित कर देती है। लेकिन अगर वह अपनी शर्तों पर जिए और किसी को फालतू तवज्जो ना दे तो फौरन उसे “अकडू और घमंडी” का तमगा थमा दिया जाता है । और खुद ना खास्ता, अगर उसने सहजता से मुस्कुरा कर या हंसकर बात कर ली ? तो फिर वही कहावत -” हंसी तो फंसी” जिंदा हो जाती है। यह कहावत किसी बुजुर्ग के अनुभव का निचोड़ है या किसी” मनचले की खुराफात” ? जवाब है कि जो औरत की मुस्कुराहट में भी शिकार ढूंढे, उस सोच की उपज है यह कहावत !

आज के दौर में अगर कोई पुरुष मदद का हाथ बढ़ाये , तो औरत को एक “चतुर लोमड़ी” की तरह “गुणा भाग” करना अनिवार्य है ।

उसे तुरंत हिसाब लगा लेना चाहिए या लगाना पड़ता है कि इस मदद की किश्तें भविष्य में किस रूप में चुकानी पड़ेगी। यहां निस्वार्थता एक भ्रम है और सावधानी बरतना ही सुरक्षा है ।

घर की दहलीज लांघते ही औरत एक अदृश्य युद्ध भूमि में कदम रखती है, यहां उसकी सालों की मेहनत से बनी “इमेज ” कांच की तरह है एक छोटी सी चूक, एक गलत फैसला, और समाज उस कांच को चकनाचूर करने मे एक सेकंड की भी देरी नहीं करता। सजा? ताउम्र का चरित्र प्रमाण पत्र !

औरत अगर अपनी काबिलियत के पंखों के साथ उड़ना चाहती है तो उसे एक अजीब हिदायत दी जाती है -” उड़ो पर पंख समेट कर” ” उड़ो मगर ज्यादा ऊंचा नहीं” ” उड़ो मगर धीरे-धीरे ” ।
क्योंकि अगर पंख ज्यादा फड़फड़ाए या ऊंची उड़ान की तैयारी की तो समाज उन्हें नोचनें काटने या उन पर कीचड़ उछलने के लिए तैयार ही खड़ा है ।
उड़ान में भी आजादी से ज्यादा अनुशासन की बेडियां है ।

अवेलेबल ( available) का लेबल

सबसे बड़ी सावधानी – काम की जगह हो या जिम, गार्डन , मेट्रो बैंक, शुरुआत में खुलकर बात करना वर्जित है वरना ” अवेलेबल” का लेबल तैयार रखा है जो कभी भी आपके व्यक्तित्व पर चिपकाया जा सकता है ।

तो स्त्रियां, इन तमाम नियमों दिशा निर्देशों और बन्दिशों की सुरक्षा पेटी ( seat belt ) बांधने के बाद ही अपनी उड़ान भरने की अनुमति पा सकती हैं ।
यह उड़ान- शायद आसमान छूने की नहीं बल्कि जमीन पर विजय कांटों से बचने की ज्यादा है ।

9 thoughts on “स्त्री : ‘एक मैनुअल’

  1. बहुत सटीक लिखा है आपने।… पंख भी है खुला आकाश भी ।फिर ना उड़ पाने की मजबूरी कैसी… लगता है आत्मा पर संस्कारों की कील ठोक दी गई है कि पंख बस यूं ही फड़फड़ाए…

      1. Very true—people applaud a woman’s wings,
        yet quietly knot strings to her flight.

        They cheer her courage from the ground below,
        but fear the height she dares to grow.
        Freedom is praised, yet permission is implied—
        as if her sky must be pre-approved.

        Still, she rises—threads or not—
        because flight was never meant to be controlled. Excellent writing it touched my heart ❤️.

  2. आज की स्त्री की सच्चाई का सूक्ष्म सटीक सीधा सरल विवरण दिया है आपने।

  3. मधु आपने वर्तमान समाज में स्त्रीयों की स्थिति का सटीक विश्लेषण किया है। बहुत बढ़िया लेख।

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