संवाद

मैं संवाद करना चाहती हूं, व्योम के उस अंधकार से,
जो असंख्य तारों में टूट कर प्रकाशमय हो जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, स्वाति नक्षत्र की उस बूंद से,
जिसे पीने की चाह में पपीहा प्यासा भी रह जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, हर उस सुगंधित पुष्प से,
जिसको देवालय से लेकर अर्थी तक सजाया जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, भारत की हर उस मां से,
जिसे शहीद बेटे के शव में ससम्मान बुलाया जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, हर उस श्रद्धेय नारी से,
रीति-रिवाज के शस्त्रों से जिसे अदेह मारा जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, भारत के हर उस पिता से,
बेटी के विवाह में जिसे कम दहेज पर छोड़ा जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, हर उस सच्चे प्रेमी से,
अपनी प्रेमिका की मौत में जिसे छूने से रोका जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, हर उस व्यथित पुरुष से,
मर्द कहकर जिसको कंधे पर रोने से रोका जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, राम की उस मर्यादा से,
जिसे निभाह अति में गर्भित भार्या को छोड़ा जाता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, बुद्ध के उस धर्म-ज्ञान से,
वियोगिनी यशोधरा से जो भिक्षा में पुत्र मांग लेता है।

मैं संवाद करना चाहती हूं, हर उस आंख के आंसू से,
जो समंदर-सा होकर भी बस कोर पर ठहर जाता है।

जानती हूं, ये मेरे संवाद कभी परिभाषित नहीं होंगे,
पर पीड़ा होती है हृदय में, तो मौन शब्द ठहर जाता है।

गीता कटियार, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर

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