
सुप्रसन्ना, प्रसिद्ध लेखिका, जोधपुर
संबंध, जीवन के उस अमृत-स्रोत का नाम है जहाँ मन निश्चिंत होकर साँस लेता है। यह वह आश्रय है जहाँ हम अपने भय, असुरक्षाएँ और अपूर्णताएँ भी निडर होकर रख सकते हैं। पर जब इस निर्मल सरोवर में संदेह की एक बूँद गिरती है, तो उसकी पारदर्शिता धुँधली पड़ जाती है।
संदेह का स्वभाव बड़ा अदृश्य होता है। यह पहले एक छोटे से प्रश्न के रूप में आता है “क्या वाकई वह मेरे साथ है?” और फिर धीरे-धीरे भीतर के विश्वास को कुतरने लगता है। संबंधों का ताना-बाना, जो विश्वास के रेशों से बुना होता है, एक शंका के झोंके से ही उलझने लगता है।
दरअसल, संदेह की जड़ हमेशा अविश्वास में नहीं होती, वह संवाद की कमी से जन्म लेता है। जब शब्द थक जाते हैं, मौन लम्बा होने लगता है, और हृदय की भाषा कोई नहीं समझ पाता, वहीं से संदेह पनपता है। जो बातें कही जा सकती थीं, वे मन में दब जाती हैं, और मन कल्पनाओं से भर जाता है। मनुष्य जब अपने ही विचारों का कैदी बन जाता है, तब सामने वाला भी पराया लगने लगता है। फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि संदेह हर बार शत्रु नहीं होता। कभी-कभी यह चेतावनी भी होता है — कि कहीं न कहीं संवाद टूट रहा है, स्नेह की धारा मंद हो रही है। इस दृष्टि से देखा जाए तो संदेह भी सुधार का अवसर देता है, बशर्ते हम उसे पहचानें और सच्चाई से संवाद करें।विश्वास और संदेह ये दोनों मनुष्य के भीतर के दो छोर हैं। संबंध इन दोनों के बीच तनी रस्सी पर चलने जैसा है। जो इस संतुलन को साध लेता है, वही प्रेम को टिकाए रख पाता है। क्योंकि प्रेम का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि समझ और सच्चाई में विश्वास है।
सच्चे संबंध वही हैं जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता हो और उत्तर देने की ईमानदारी। जहाँ किसी के मौन में भी स्नेह पढ़ा जा सके और किसी की आँखों में सत्य देखा जा सके। ऐसे संबंधों में संदेह के लिए कोई जगह नहीं बचती।इसलिए कहा गया है “संदेह वह धुंध है जो सूर्य को नहीं रोकती, बस दृष्टि को धुंधला कर देती है।”
अंततः संबंधों का सौंदर्य उनके विश्वास में नहीं, बल्कि उस निरंतर प्रयास में है, जहाँ दोनों हृदय एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते रहते हैं। जब संवाद जीवित है, संवेदना जीवित है . तब संबंध अडिग रहते हैं, चाहे जीवन में कितने ही तूफ़ान क्यों न आएँ।
Bahut badhiya aur satya dikhata lekh
सुंदर लेख
बहुत सुंदर लिखा सुप्रसन्ना जी
अविश्वास की जड़ में संवाद की कमी या अनुपस्थिति ही होती है ।
“अंततः संबंधों का सौंदर्य उनके विश्वास में नहीं, बल्कि उस निरंतर प्रयास में है, जहाँ दोनों हृदय एक-दूसरे को समझने की कोशिश करते रहते हैं।”