
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज
आप सोच रहे होंगे…यह अचानक क्या हुआ?
पर हमारा चौंकना भी उसी बचपन का हिस्सा है, जहाँ हर अचरज खेल बन जाता था और हर खेल याद. मोबाइल नहीं थे, न वीडियो गेम. थे तो बस मुफ़्त के खेलअंटी (जिसे पढ़े-लिखे लोग कंचे कहते), गुल्ली-डंडा, सतोलिया, पाकिट, छाप, छिपाछाई, दड़ामार, नदी-पहाड़, रेलगाड़ी और जाने कितने नाम, जिनमें पूरा बचपन समाया रहता था.
छाप यह खेल भी कमाल का था. माचिस के खाली खोखे, उनके ऊपर छपे चित्रबस वही हमारी मुद्रा थे. जितना आम ब्रांड, उतनी कम कीमत. जहाज छाप, घोड़ा छाप, चीता छापसब रोज़मर्रा के थे, इसलिए दोयम. पर ऊँट छाप? बस पूछिए मत. एक ऊँट छाप के बदले चार-पाँच घोड़ा छाप देने पड़ते. जिसके पास रेयर छाप होती, उसके चेहरे पर रौब अपने आप उतर आता. कभी-कभी तो वह आम छाप वालों के साथ खेलने से भी मना कर देता..मानो राजसी खेमे में आमंत्रण सीमित हों.
इस खेल का असली मज़ा छाप ढूँढने में था. टोलियाँ बनतीं, मोहल्ले खंगाले जाते. शहर में एक ही ब्रांड चलता था, इसलिए ख़ज़ाना कम मिलता. तब रेल स्टेशन हमारी उम्मीद बनता, जहाँ अलग-अलग जगहों से आए लोगों की जेबों से गिरी माचिसें मिल जातीं. पटरियों पर चलते हुए देश के कोने-कोने की छापें हाथ लगतीं. महिदपुर रोडदिल्ली-मुंबई मुख्य लाइन का स्टेशनमानो हमारी सोने की खान था. यूनिक छाप मिलती और हम जीत की चमक लिए लौटते.
फिर समय बदला. माचिस की छापों की जगह फिल्मों के छोटे-छोटे पोस्टरों ने ले लीताश के पत्तों के आकार के. तब प्रमोशन के लिए बड़े शो नहीं होते थे. किराने की दुकान, गोली-बिस्किट वाला, चूरन की गोलीयहीं से पोस्टर निकलते. हम उन्हें सहेजते, गिनते, चमकातेजैसे कोई संग्रहालय तैयार हो रहा हो.
खेल ताश जैसा था. पत्ते फेंटे जाते. फिर दांव
श्रीदेवी चश्मे में! या धर्मेंद्र घोड़े पे! अमिताभ मोटर साइकिल पे!
जिसने जो कहा, वही उसका भरोसा. अगर वही पत्ता निकलातो जीत. जितने पोस्टर दांव पर, उतने सामने वाले से मिलते. नहीं निकलातो हार. पैसे का कोई सवाल नहीं था. दांव पर थी बस उम्मीद, दोस्ती की ठिठोली, और जीत की खिलखिलाहट.
और श्रीदेवी
चश्मे में श्रीदेवी हमारी सबसे मज़बूत पुकार थी. चश्मा जैसे उसके चेहरे पर नहीं, हमारे खेल पर चढ़ा हो. शायद दिवंगत श्रीदेवी को भी नहीं पता होगाऔर न ही बोनी कपूर, जान्हवी या खुशी कोकि एक चश्मा हमारे बचपन में कितना अहम था. वह चश्मा हमारी आवाज़ बनता, हमारी किस्मत पलटता, और हार-जीत को हँसी में बदल देता.
आज सोचता हूँ तो लगता है. हमारे खेल छोटे थे, पर दुनिया बड़ी. जीत छोटी थी, पर यादें विशाल. और श्रीदेवी चश्मे में कोई दांव नहीं था..वह एक दौर था, जो आँखों पर आज भी उसी चश्मे से दिखता है.
मजा आ गया पढ़कर। माचिस के जमाने…. यही हमारी सबसे बड़ी दौलत थी। ये हमारे वो छुपे हुए खजाने थे जिनकी वजह से होठों पर हंसी और दिल में मस्ती आती थी
आपका ऐसा ही प्रेम बना रहे, बड़ी खुशी होती है जब आपकी टिप्पणी आती है तो..