
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर बिहार
सम्पूर्ण वातावरण ढोल, ढाक, ताशों की लयबद्ध स्वरों से गुंजायमान था।सूरज की लालिमा के साथ ही घर-घर से दुर्गा स्तोत्र, आरती के साथ शंख, घंटियों की आवाज़ें आने लगतीं। शारदीय नवरात्रों और देवी दुर्गा मइया की भक्ति में शहर डूबा था।
आज नौमी की संध्या-आरती के बाद मालकिन ने ख़ुद भी फलाहार किया और रेशमा को भी खाने को दिया।
मालकिन उससे बहुत प्यार करती थी। वह छोटी थी जब उसकी अम्मा गोद में लेकर आती थीं।
मालकिन ने ही उसका नाम रेशमा रखा था। रेशमा मालकिन का अनुसरण करती थी।
जैसा-वैसा वह करती या कहती, वैसा ही रेशमा करती थी।रेशमा खाकर अपने घर जाने के लिये निकल गई और मालकिन ने गार्ड यानी मुझे, गेट बंद करने को कहा और अपने कमरे में सोने चली गईं।शरद की रात की ठंडी हवा की सिहरन से मालकिन नींद से जाग उठीं।खिड़की पर जब आई तो नीचे गली में काफी शोर था। तभी उन्होंने देखा कि एक लड़की भाग रही है — उसके पीछे से दो-तीन गुंडे जैसे आदमी थे।लड़की की पीठ उघड़ी हुई थी और एक बाँह भी फटी हुई थी। वह बेतहाशा भाग रही थी।
“बच के कहाँ जाएगी? आज तुझे छोड़ूँगा नहीं। कब तक तड़पाएगी और अपनी जवानी बचाएगी? देखता हूँ आज तुझे कौन बचाता है!” बड़बड़ाते हुए गुंडे उसके पीछे दौड़ रहे थे।
घड़ी देखी. रात ग्यारह बज रहे थे। पैरों में स्लीपर डालकर गेट खोलते ही मालकिन गुंडों के पीछे देवी माँ से प्रार्थना करते हुए तेजी से भागीं।”हे माँ! इस बच्ची की रक्षा करना, जिसकी भी बच्ची है, पर है तो तेरी ही संतान। माँ, तू स्वर्ग से धरती पर आई है। आज अपने होने का प्रमाण दे .उस बच्ची की रक्षा करके, माँ। मेरी भक्ति, पूजा से थोड़ी भी प्रसन्न है तो मेरे विश्वास की लाज रख ले मैया!”लड़की के पीछे गुंडे थे, पर जब मालकिन उनके पास पहुंचीं तो वे मंदिर के सामने ठिठक गए। लड़की त्रिशूल लिए खड़ी थी।
“अरे..! यह तो रेशमा है..! साक्षात देवी..! वही रूप -शिव की शक्ति रूपा.. माँ जगदम्बा..!”
“तू आज नहीं बचेगा। जब-जब धरती पर तुम जैसे राक्षसों का अत्याचार बढ़ा है, तब-तब उसका संहार करने मुझे आना पड़ा है। आज तू नहीं बचेगा…” त्रिशूल ने गुंडे के सीने से आर-पार कर दिया..! ईश्वर किसी न किसी रूप में हमारी रक्षा करते हैं। सिर्फ़ विश्वास होना चाहिए। और जब स्त्री की अस्मिता पर हमला होता है, तो वही स्त्री चंडी बन जाती है।