डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित अनुभवों से भरी कलात्मक प्रस्तुति

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित गज़ल संग्रह “मुझ में भी रहता है इकतारा” दिल और दिमाग के बीच बहते उस पुल की तरह है, जिस पर चलते हुए पाठक जीवन, संवेदना, अनुभव और दर्शन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ता है. कुल 70 ग़ज़लें, 36 मुक्तक और 35 दोहे इस संग्रह को विविधता से भरते हैं और पाठक को एकरसता से दूर रखते हैं.
यह संग्रह केवल भावों का संसार नहीं, बल्कि अनुभवों की परत-दर-परत खुलती हुई किताब है. कभी इसमें प्रतिकूलताओं और अनुकूलताओं का द्वंद्व दिखाई देता है, तो कभी खुशियों व व्यथाओं के बीच जीवन का संतुलन. कहीं सरलता-सच्चाई आदर्श बनकर उभरती है, तो कहीं सभ्यता और संस्कारों की विरासत बड़े आदर से शब्दों में ढलती दिखाई देती है.
जमाना आज तक जिसको हिमालय ही समझता है,
मगर जब गौर से देखा, लगा शिव की जटाएं हैं
जैसी पंक्तियाँ न सिर्फ कल्पना का विस्तार करती हैं बल्कि प्रतीक और उपमानों के माध्यम से पाठक के भीतर आध्यात्मिक स्पर्श भी जगाती हैं. डॉ. तारा की भाषा सहज है, पर गहराई से भरी; शब्द सरल हैं पर भावनाएँ जटिल और अर्थवान. इस संग्रह का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसे साहित्यकार कमलेश भट्टकमल जी, पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री जी, शायर असलम राशिद जी सहित अनेक प्रतिष्ठित साहित्यकारों ने अपनी भूमिका से समृद्ध किया है, जिससे पुस्तक की साहित्यिक विश्वसनीयता और मूल्य दोनों में वृद्धि होती है.

ग़ज़लें हो या मुक्तक प्रत्येक रचना में जीवन का स्पर्श है, समाज का अनुभव है और मानवीय रिश्तों की नमी भी. कहीं माँ की प्रतीक्षा है, कहीं वक्त की बेरहमी; कहीं पुस्तकों में छिपे गीत हैं, तो कहीं जीवन को कथा मान लेने की सहज स्वीकारोक्ति. यह संग्रह हिंदी साहित्य और विशेषतः आधुनिक ग़ज़ल प्रेमियों के लिए एक सुंदर उपहार है जिसे पढ़ते हुए पाठक अपने भीतर कहीं न कहीं स्वयं को पाता है.
संक्षेप में कहें तो-यह पुस्तक संवेदनाओं का दर्पण, जीवन का दस्तावेज़ और शब्दों की सधी हुई प्रस्तुति है. हर रचना पाठक को सोचने, ठहरने और फिर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती है.
प्रस्तुत है.. इस गजल संग्रह से एक गजल-
कभी प्रतिकूलताएं हैं कभी अनुकूलताएं हैं
कभी खुशियां है जीवन में कभी केवल व्यथाएं हैं.
सरलता और सच्चाई हमारी मान्यताएं हैं
इन्हें मानो या ना मानो यही अनिवार्यताएं हैं .
सुबह के वक्त खिड़की खोलकर आकाश जब देखा
लगा सारे समुंदर बादलों मैं ही समाएं हैं.
हमारी सभ्यता ने आज तक पूजा बुजुर्गों को
बड़ों के सामने सिर को झुकाने की प्रथाएं हैं.
किताबें तो लिखी मैंने ग़ज़ल और गीत को लेकर
पढ़ी जब ध्यान देकर तो लगा ये तो कथाएं हैं.
जमाना आज तक जिसको हिमालय ही समझता है
मगर जब गौर से देखा , लगा शिव की जटाएं हैं.
तरसती मर गई अम्मा मगर वो आ नहीं पाया
बदलते इस जमाने में ये कैसी व्यस्तताएं आए हैं.
धन्यवाद सुरेश जी
taragupta@0106gmail.com