लफ़्ज़ों के तीर

झरना माथुर, प्रसिद्ध लेखिका

दायरे जो सिमटते गये
फासले रोज बढ़ते गये

रोज हमको तराशा गया
ऐब फिर भी निकलते गये

मौसमी अंदाज था उसका
वक्त जैसे बदलते गये

लफ़्ज़ उसके लगे तीर से
ज़ख्म दिल में उभरते गये

हर किसी ने गिराया झरना
हम हुनर से संभलते गये

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