
– सुधा शर्मा, कानपुर
“तुमने नहा लिया क्या?”
स्नानघर से बाहर निकल रही रीना से उसकी वृद्ध सासू माँ ने पूछा।
“हाँ, माँ जी।”
“और कपड़े?” सासू माँ फिर पूछ बैठीं।
“वह भी साफ कर लिए हैं, मम्मी। बाकी मशीन में धो दूँगी।”
“तुम तो नहा-धो ली, बेटा?”
“हाँ, माँ जी। अब आप यह बताइए कि नाश्ते में क्या लेंगी? जल्दी से बना लाऊँ।”
“भूख नहीं है,” सर्दी-खाँसी से बेहाल निर्मला जी ने कहा, “नहाने का मन है।”
“अरे नहीं, माँ जी। अब आपका शरीर बहुत कमजोर हो गया है। ज़रा-सी ठंड में आप बीमार हो जाती हैं। पहले नाश्ता कर लीजिए, फिर मैं आपके कपड़े बदलवा दूँगी। आप अच्छा महसूस करेंगी।”
यह कहते हुए रीना तेज़ी से रसोई की ओर बढ़ गई।
वहाँ वह सासू माँ के लिए हलवा बनाते हुए, उनके कमरे से आ रही आवाज़ पर भी ध्यान दे रही थी.
“हमने कभी सोचा भी नहीं था कि जीवन में ये दिन भी आएँगे… कि एक दिन हमारा शरीर इतना कमजोर हो जाएगा कि नहाने-धोने से लेकर हर काम के लिए दूसरों का मोहताज होना पड़ेगा।”
“हमारी आजी अपने बुढ़ापे में अक्सर कहा करती थीं.
‘उई दिन कहाँ गए? मोरी माई…’”
अपनी साँसों को लंबा खींचते हुए, मेज़ पर नाश्ता रखते समय, बहू रीना को हसरत भरी नज़रों से देखते हुए, कमजोर और वृद्ध निर्मला जी खुद से ही कहती जा रही थीं।