दिवाली आने में एक महीना बचा था. श्रद्धा और प्रशांत दिवाली पर हमेशा प्रशांत के घर जाते थे. श्रद्धा का मायका और ससुराल एक ही शहर में था और बस दो गली छोड़कर ही दोनों घर थे. ससुराल में भी सास-ससुर अकेले रहते थे. प्रशांत और उसकी बहन प्रिया दो भाईबहन थे, बहन की भी शादी हो चुकी थी. मायके में भी श्रद्धा के मम्मीपापा अकेले ही रहते थे. श्रद्धा और श्रुति दोनों बहनें थीं और दोनों की शादियां हो चुकी थीं. श्रद्धा जब भी ससुराल जाती, सास-ससुर अच्छे थे, पर उन्हें श्रद्धा का वहां रहते हुए मायके जाना ज्यादा पसंद नहीं था. बाकी समय में तो फिर भी श्रद्धा कुछ नहीं कहती, पर दिवाली पर उसका मन अंदर से बहुत दुखी होता था. हर बार श्रद्धा अपने ससुराल में मिठाइयां बनाती, घर सजाती, रंगोली बनाती और मन करता कि अपने घर जाकर माँ के आँगन में भी रंगोली बना दे. उसे लगता कि उसकी माँ भी वहाँ अकेले ही सब कर रही होंगी. जब तक दोनों बहनें मायके में थीं, तब तक बहुत रौनक रहती थी, पर अब वहाँ सूनापन छा गया था.
दिवाली के पाँच दिन वह रोज ससुराल में घर के आँगन में रंगोली बनाती थी. उसकी सास सुबह से कहतीं श्रद्धा, रंगोली कब बनाएगी? श्रद्धा नहा कर सबसे पहले रंगोली बनाती और रंगोली बनाते हुए हमेशा सोचती कि काश वह अपने घर भी जाकर रंगोली बना पाती. पर सास को तो दिवाली के दिनों में उसका मायके जाना पसंद ही नहीं था.
एकदो बार श्रद्धा किसी काम से मायके गई तो उसकी आँखें भर आईं. माँ आसपास के बच्चों से और कामवाली से कह रही थीं शगुन की छोटीसी रंगोली यहाँ भी बना दो.
पर न माँ श्रद्धा से कह पाईं कि तू थोड़ा समय निकालकर यहाँ रंगोली बना दे, और न ही श्रद्धा किसी से कह पाई कि उसे अपनी माँ के आँगन में रंगोली बनाने जाना है.
श्रद्धा बिस्तर पर लेटे हुए यही सोच रही थी कि इतने साल हो गए शादी को, पर वह कभी भी अपने मन की यह बात किसी को नहीं कह पाई. बात बहुत छोटीसी थी, पर शायद उसे कहने की हिम्मत उसमें आज भी नहीं थी आधे घंटे में कौन सा तूफान आ जाएगा, दो गली छोड़कर ही तो मायका है! शादी से पहले वह यही सोचती थी कि मायकाससुराल दोनों परिवार मिलकर त्योहार मनाएँगे, पर यहाँ तो वह एक रंगोली तक नहीं बना पाई.
भाई था नहीं, इसीलिए मायके की जिम्मेदारी उसकी ही बनती थी. ऐसा नहीं था कि श्रद्धा को अपना ससुराल पसंद नहीं था, पर यह दुख उसे हमेशा था कि वह बेटी है, फिर भी अपने घर जाने के लिए उसे ससुरालवालों का मूड देखना पड़ता है. वैसे भी वह राखी पर कम ही मायके जा पाती थी, पर उस समय भी सासससुर उसे फोन करके बुला लेते थे यहाँ भी आ जाओ. फिर दिवाली पर क्यों नहीं कहते जाओ, अपनी माँ को भी थोड़ी मदद कर आओ?
कभीकभी वह सोचती थी कि शायद इसी लिए लोग भगवान से बेटा मांगते हैं, क्योंकि बेटियाँ शादी के बाद न सिर्फ पराई हो जाती हैं, बल्कि अपने ही घर जाने के लिए भी मोहताज हो जाती हैं.
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर
उत्तम
विचारणीय है
यही समाज की सच्चाई है।
अब परिवर्तन हो गया है । लड़कियां स्वयं निर्णय लेती हैं।